भोपाल, मनोज तिवारी। मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा दिलाने की सारी उम्मीदें अब बाघों की वैज्ञानिक तरीके से गणना पर टिकी हुई हैं। 4 फरवरी से शुरू होने जा रही गिनती में वन विभाग पहली बार इस तरीके से जंगल में बाघों के होने के साक्ष्य जुटाएगा। इसके लिए विभाग अप्रैल से सितंबर, 2017 तक विशेष प्रशिक्षण का आयोजन कर मास्टर ट्रेनर तैयार कर चुका है। प्रदेश के वन अफसर मानते हैं कि पिछली गणना (वर्ष 2014 में) वैज्ञानिक तरीके से बाघों की गिनती न होने से मध्यप्रदेश के 'टाइगर स्टेट" का दर्जा छिन गया था। इस साल के 11 महीनों में 23 बाघों की मौत के बाद और हर चार साल में होने वाली इस गणना का समय करीब आने के कारण सभी वन्य जीव प्रेमियों की निगाहें इस पर लगी हुई हैं।

ऐसे की जाएगी बाघों की गिनती : बाघों की गणना तीन चरणों में होगी। पहले चरण में सात दिन गिनती होगी। इसमें शुरू के तीन दिन मांसाहारी वन्यप्राणियों के अप्रत्यक्ष चिन्ह (विष्ठा, जमीन एवं वृक्षों पर पंजों से खरोंच के निशान, आवाज, पगमार्क और घास या जमीन पर लोट लगाने के निशान) देखे जाएंगे। इस तरह की गिनती प्रति बीट, प्रतिदिन 5 किमी में होगी। दूसरे तीन दिन दो किमी की ट्रांजिट लाइन डाली जाएगी। यह सीधी होगी। इस लाइन पर चलते हुए कर्मचारी दाएं और बाएं दिखने वाले जानवरों का डाटा तैयार करेंगे। इसमें अमूमन शाकाहारी जानवर दिखाई देते हैं। जबकि सातवें दिन पत्रकों का मिलान होगा। इस लाइन पर हर 400 मीटर पर स्टॉप होगा। यहां की वनस्पति और खरपतवार रिकॉर्ड में दर्ज की जाएगी। दूसरे चरण में वन्यप्राणी संस्थान देहरादून चिन्हों के हिसाब से जानवरों की उपस्थिति के प्रमाण तय करता है। तीसरे चरण में उस क्षेत्र का सैटेलाइट डाटा लेकर मैदानी अमले की जानकारी का मिलान किया जाता है।

प्रशिक्षण का अभाव बना था कारण : विशेषज्ञों के मुताबिक पिछली गणना में पत्रक भरने में गड़बड़ी हुई क्योंकि इस काम में लगे कर्मचारी अप्रत्यक्ष चिन्ह समझ नहीं पाए। मिट्टी और घास पर लोट लगने से पड़ने वाले निशान से वे यह भी समझ नहीं पाए कि यह बाघ के लोट लगाने का निशान है या अन्य किसी जानवर का। इस बार इस काम में लगने वाले कर्मचारियों को पहले से ही प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इस वजह से उम्मीदें भी बंधी हैं।

छोटी टेरेटरी को उत्पादक बनाना जरूरी : पेंच टाइगर रिजर्व के पूर्व फील्ड डायरेक्टर आरजी सोनी कहते हैं कि बाघों की संख्या ज्यादा हो और क्षेत्र कम, तो उस क्षेत्र को उत्पादक बनाने से सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। बाघों का जीवन शाकाहारी जानवर और पानी पर निर्भर है। जंगल में पानी रहेगा, तो घास रहेगी। घास शाकाहारी जानवरों का भोजन भी है और उनके छिपने और प्रजनन के लिए जरूरी भी। अच्छी घास मिलेगी, तो इन जानवरों की संख्या बढ़ेगी। जब जंगल में ही खाने और पीने की पर्याप्त व्यवस्था मिल जाएगी, तो बाघ जंगल से बाहर नहीं जाएगा। प्रदेश के एक-दो संरक्षित क्षेत्रों में ऐसे प्रयास किए गए हैं।

कुछ नहीं दोगे तो मुखबिरी नहीं होगी : वन विभाग के जानकार बताते हैं कि मुखबिरी के लिए अलग से बजट होता है, लेकिन उसका सही इस्तेमाल नहीं होता। वे कहते हैं जंगल के आसपास चरवाहे, ग्रामीणों को जासूस बनाएं और उन्हें अपेक्षा से अधिक राशि दें, तो जानकारी कैसे नहीं मिलेगी। अभी पांच सौ और हजार रुपए देकर पांच हजार दिखाए जाते हैं।