संसदीय राजनीति में विरले ही ऐसे अवसर आते हैं, जब सत्तारूढ़ दल संविधान संशोधन जैसा कदम उठाए और उसके राजनीतिक विरोधियों के पास उसका समर्थन करने के अलावा कोई विकल्प ही न हो। मंगलवार को लोकसभा में ऐसा ही हुआ। आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों (सभी अनारक्षित वर्ग कहना सही होगा) को शिक्षा और नौकरी में दस फीसदी आरक्षण के लिए 124वां संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए सरकार को किसी विपक्षी दल को मनाने की जरूरत नहीं पड़ी। लोकसभा चुनाव से पहले यह मोदी सरकार का रामबाण (अयोध्या वाला नहीं) है। मोदी का यह कदम केवल राजनीतिक रूप से ही उनकी पार्टी के लिए फायदेमंद नहीं होगा, बल्कि यह समाज में भी कई बदलाव लाएगा।

भाजपा समर्थक पिछले करीब एक साल से जिस बात की कमी महसूस कर रहे थे, वह काम आखिरकार मोदी ने कर दिया। वह था विमर्श बदलने और तय करने का। इस एक कदम से उन्होंने राम मंदिर के मुद्दे को पीछे धकेल दिया। विपक्ष को फौरी तौर पर निहत्था कर दिया है। लोकसभा चुनाव सामने है और एक बार फिर मोदी राष्ट्रीय विमर्श के मुद्दे तय कर रहे हैं। आर्थिक आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर उनके विरोधियों को विरोध का रास्ता नहीं सूझ रहा। एक ही बात कही जा रही है कि यह चुनाव को ध्यान में रखकर उठाया गया कदम है। साल 2014 में संप्रग का खाद्य सुरक्षा कानून, उससे पहले मुसलमानों और जाटों को आरक्षण देने का कदम क्या राजनीतिक लाभ के मकसद से उठाए गए कदम नहीं थे? इनमें से किसी का चुनावी लाभ कांग्रेस को नहीं मिला। याद रखिए कि 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिलाने के लिए अपनी सरकार कुर्बान कर दी थी। पिछड़े वर्गों को आरक्षण तो मिल गया, पर वीपी सिंह और उनकी पार्टी कभी सत्ता में नहीं लौटी। सवाल है कि फिर नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को गैर-आरक्षित हिंदू, मुसलमान, ईसाई और दूसरे समुदायों के लिए दस फीसदी आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था कराने से चुनावी लाभ क्यों मिलेगा? पहली बात तो यह कि यह कदम प्रधानमंत्री के 'सबका साथ सबका विकास के नारे की एक बार फिर ताईद करता है। संविधान बनाते समय जब दलितों, आदिवासियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई तो उस पर एक राजनीतिक सर्वानुमति थी, लेकिन पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के समय ऐसा नहीं था। उस समय सभी पार्टियां संशय में थीं कि किसको राजनीतिक फायदा होगा और किसको नुकसान। वीपी सिंह को लगा कि वह जनता दल के लिए एक स्थायी वोट बैंक बना रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा को लगा कि उन्हें हमेशा के लिए सत्ता से बाहर रखने का इंतजाम हो रहा है। पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के समय सवर्णों में भारी नाराजगी थी। उन्हें लग रहा था कि उनसे कुछ छीनकर पिछड़ा वर्ग को दिया जा रहा है। पिछड़ा वर्ग को लग रहा था कि उन्हें उनका संवैधानिक हक देर से ही सही, मिल रहा है। सवर्णों को लगा कि एक झटके में उनके लिए 27 फीसदी अवसर कम हो गए। सवर्णों के इस आरक्षण की व्यवस्था में किसी से कुछ छीना नहीं जा रहा है। इसलिए विपक्षी दल इसका विरोध नहीं कर पा रहे हैं। सिर्फ लालू यादव के राजद ने अपना यादव-मुस्लिम जनाधार एकजुट करने के लिए इसका विरोध किया। जाहिर है कि उसके नेता यह भूल रहे हैं कि इससे मुसलमानों की दशकों पुरानी आरक्षण की मांग पूरी होती है। उन्हें धर्म के आधार पर आरक्षण तो नहीं मिला, परंतु अब पिछड़ा वर्ग के साथ ही अगड़ों के आरक्षण में भी उनकी हिस्सेदारी होगी। एक आकलन के मुताबिक नई व्यवस्था से सभी वर्गों के करीब 19 करोड़ लोगों को लाभ मिलेगा।

आरक्षण का मुद्दा देश में सामाजिक वैमनस्य का कारण बनता जा रहा था। देश में दो वर्ग बन गए थे। एक, जिसे आरक्षण का लाभ मिला है और दूसरा, जो इससे वंचित है। आजादी के बाद या उससे पहले से ही समाज के वंचित वर्गों में सामाजिक सीढ़ी पर ऊपर जाने की होड़ थी। आरक्षित वर्ग में शामिल होना सामाजिक प्रतिष्ठा की दृष्टि से कमतर माना जाता था, लेकिन पिछड़ा वर्ग आरक्षण के बाद से माहौल बदल गया। आज समाज का हर तबका आरक्षित वर्ग में शामिल होने के लिए आतुर है। महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पाटीदार और हरियाणा में जाट पिछड़ा वर्ग में शामिल होने के लिए हिंसक आंदोलन कर चुके हैं। जो जातियां पिछड़ा वर्ग में हैं, वे अब दलित और आदिवासी बनना चाहती हैं। यह ऐसी होड़ है, जिसका अंत कहां जाकर होगा, किसी को पता नहीं। बहुत से आरक्षण विरोधियों को लगने लगा था कि यह अंधी दौड़ एक दिन आरक्षण के खात्मे की वजह बनेगी।

मोदी सरकार के इस एक कदम से आरक्षित और अनारक्षित वर्ग का सामाजिक भेद खत्म हो जाएगा। अब समाज के हर वर्ग को आरक्षण मिल जाएगा। इसके साथ ही शिक्षण संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में 40 फीसदी स्थान ऐसे होंगे, जिन्हें मेरिट के आधार पर हासिल किया जा सकता है। आरक्षण की इस व्यवस्था के विरोध में एक तर्क यह दिया जा रहा है कि सरकारी नौकरियां हैं कहां? तथ्यात्मक रूप से यह बात तो सही है कि सरकारी नौकरियां बढ़ नहीं रहीं, लेकिन मराठा, पाटीदार और जाट आरक्षण का समर्थन करते वक्त यह तर्क कहां चला गया था? इस पर विवाद हो सकता है कि इस कदम से कितने लोगों का फायदा होगा, किंतु एक बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि मोदी सरकार का यह कदम समाज में आरक्षण के कारण पैदा हुई कटुता को कम करेगा। आरक्षण के हमाम में अब सब बराबर हैं।

समाज में किस तरह की कटुता है, इसका अंदाजा कुछ समय पहले सरकार की ओर से अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के बाद की प्रतिक्रियाओं से लगा। हालांकि सरकार ने नया कुछ नहीं किया था। सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले वाली व्यवस्था बहाल कर दी थी, लेकिन उत्तर भारत के सवर्णों में इसकी वजह से इतनी नाराजगी हुई कि उन्होंने भाजपा को सबक सिखाने की ठान ली और मध्य प्रदेश व राजस्थान में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा।

मोदी सरकार ने पिछले साढ़े चार साल में भाजपा के सामाजिक आधार को व्यापक बनाया है। अब समाज का वंचित वर्ग उसके साथ 2014 के मुकाबले ज्यादा मजबूती से जुड़ा है, लेकिन पार्टी के लिए समस्या यह थी कि पिछले करीब एक साल से उसका पारंपरिक समर्थक उससे नाराज था। इन दोनों में तादात्म्य बैठाने में उसे मुश्किल हो रही थी। 124वें संविधान संशोधन से उसकी यह समस्या हल हो जाएगी, इसके आसार दिख रहे हैं। आर्थिक आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन यह उल्लेखनीय है कि इसमें किसी जाति, धर्म या क्षेत्र से भेदभाव नहीं किया गया है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)