हाल ही में मप्र पुलिस के लिए एक सरकारी आदेश जारी हुआ। हेलमेट और सीट बेल्ट का उपयोग नहीं करने वाले पुलिसकर्मी का ड्राइविंग लाइसेंस निलंबित या निरस्त कर दिया जाएगा ! जैसे बंद गली के आखिरी मकान में उजाले की उम्मीद की जाए, ठीक वैसी ही है यह मंशा! आदेश का असर कहां और कितना होगा, परिणाम कैसे व्यवस्था को प्रभावित करेंगे, क्या कोई ऐसा सुधार संभव हो पाएगा, जिससे सीख लेकर किसी और को सुधारा जा सके, ऐसा कुछ भी फिलहाल कहा नहीं जा सकता। हां, यह जरूर है एक बेहतर वजह व्यवहार में आना ही चाहिए।

क्योंकि, सबसे निराशाजनक है किसी अच्छे प्रयास का पराजित हो जाना! उदाहरण के लिए इंदौर। पिछले एक साल में हेलमेट को लेकर पांच बार छोटे-बड़े अभियान चलाए गए, लेकिन हर बार असफल रहे। क्यों? इसका भी स्पष्ट जवाब है। जन जागरूक नहीं है और तंत्र के होने का जरा-सा भी असर नहीं है! केंद्रीय परिवहन मंत्रालय का संदर्भ बताता है कि 2016 में देश की सड़कों पर हर रोज औसतन दुपहिया वाहन चलाने वाले 28 लोगों की मौत की वजह हेलमेट नहीं पहनने और 15 की सीट बेल्ट नहीं बांधने की वजह से हुई। मरने वालों में 68 फीसदी 18 से 45 वर्ष के थे।

यानी घर अपने कमाने वाले सदस्यों को बड़ी संख्या में खो रहा है। इसी मंत्रालय की 2017 में जारी रिपोर्ट की गहन पड़ताल बताती है कि मध्यप्रदेश में, 2016 में केवल हेलमेट नहीं पहनने से ही 345 और सीट बेल्ट नहीं लगाने से 206 मौतें हुईं। लेकिन, कुछ ऐसा भी है जो प्रेरणादायी है। देश के सबसे घातक हाइवे में से एक है रांची जमशेदपुर को जोड़ने वाला नेशनल हाइवे (नंबर 33)। इसी के पास है शालबनी। यह देश का ऐसा गांव है, जहां दुपहिया चलाने वाले 100 फीसदी युवाओं ने हेलमेट को अपनाया है। 2016 में इसी गांव से पहली बार 'सेल्फी विथ हेलमेट" अभियान शुरू किया गया। यह अब ओडिशा सहित कई राज्यों में युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो रहा है।

अभियान को शुरू करने वाले जमशेदपुर के निगमायुक्त संजय कुमार पांडे बताते हैं- युवाओं में सेल्फी का क्रेज देखते हुए लगा कि यही माध्यम है जो युवाओं को हेलमेट लगाने के लिए प्रेरित कर सकता है। इसके पीछे सोचसंदेश यह था कि सेल्फी यदि अच्छे अवसरों- अच्छे लोगों के साथ ली जाती है, तो हेलमेट से अच्छा क्या है! नेशनल हाइवे पर होने वाली दुर्घटनाओं में सबसे ज्यादा शिकार इसी इलाके और आसपास के गांववाले ही थे, इसलिए हमने अभियान के लिए शालबनी को चुना। 300 की आबादी वाले इस गांव के 50 घरों में दुपहिया वाहन थे। 33 के पास हेलमेट था। बाकी 14 को भी हेलमेट दिलवाया और सेल्फी विथ हेलमेट की तस्वीरें वायरल कीं। सोशल मीडिया पर आई सुर्खियों से आसपास के कई गांव अभियान से जुड़ गए। एक सोच, एक सपने का यूं विस्तार पा जाना बड़ी बात इसलिए है कि यह जागरूकता जिस जमीन से जुड़ी है वहां आमतौर पर कई सरकारी सपने पहले पायदान पर ही दम तोड़ चुके थे।

एक और प्रयास उल्लेखनीय है। इंदौर होलकर राजवंश से जुड़े रिचर्ड होलकर एक संस्था से जुड़े हुए हैं, नाम है इंडियन हेड इंजुरी फाउंडेशन। यह तब साकार हुआ जब जोधपुर (राज.) राजघराने के महाराजा गजसिंह के बेटे शिवराज सिंह की 2007 में पोलो खेलने के दौरान सिर पर चोट लगने से मौत हो गई थी। उन्होंने हेलमेट पहन रखा था लेकिन दुर्घटना के दौरान वह गिर गया इसीलिए सिर पर गंभीर चोट आई। लंबे इलाज के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। जवान बेटे को खोने के दर्द को गजसिंह ने फाउंडेशन के रूप में ढाला और तब से बच्चों में हेलमेट के प्रति जागरूक करने का अभियान चला रहे हैं।

संस्था के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर कमोडर (रिटायर्ड नेवी ऑफिसर) रणवीर तलवार बताते हैं कि फाउंडेशन ने दिल्ली में 20 हजार स्कूली बच्चों के लिए वर्कशॉप की। पुणे और दिल्ली में लगभग 12 हजार बच्चों को हेलमेट (खासतौर पर डिजाइन करवाया गया) बांटा। उसके बाद जब निजी तौर पर सर्वे किया तो पता चला कि 20 फीसदी बच्चे ही हेलमेट का उपयोग कर रहे हैं। मतलब, उपलब्धता से ज्यादा जागरूकता की जरूरत है! यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सड़क दुर्घटना में हम हर साल 15,600 बच्चों को खो देते हैं, जिनकी उम्र 8 से 13 साल होती है। बचपन नासमझ है, इसीलिए सांसों पर संकट है! यदि हमारी समझ के दायरे अब भी नहीं बढ़े तो यह दर्द असहनीय होता जाएगा!