Naidunia
    Sunday, December 17, 2017
    PreviousNext

    आलेख : राहुल को लिखनी होगी नई इबारत - भवदीप कांग

    Published: Thu, 07 Dec 2017 11:12 PM (IST) | Updated: Fri, 08 Dec 2017 04:00 AM (IST)
    By: Editorial Team
    trump-jerusalem 07 12 2017

    छब्बीस साल पहले का एक दृश्य है। एक गमगीन, शर्मीला-सा 21 वर्षीय युवक अपने पिता की पार्थिव देह को मुखाग्नि दे रहा है। इस दृश्य को टीवी पर देख लाखों-करोड़ों देशवासियों की आंखें नम हो गई थीं और लोगों की उस युवक के प्रति सहानुभूति उमड़ पड़ी थी। वह युवक थे राहुल गांधी, जो इन दिनों अपने पिता (या कहें कि दादी, उनके पिता और उनके भी पिता) की विरासत संभालने की ओर कदम बढ़ाते हुए लोगों के साथ एक बार फिर भावनात्मक तार जोड़ने की कोशिश में हैं। पिछले कई वर्षों की ऊहापोह के बाद आखिरकार अब वे कांग्रेस के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। लेकिन क्या वे एक नेता के तौर पर भी परिपक्व या कहें कि पूरी तरह तैयार हो चुके हैं?


    तकरीबन 12 साल तक विदेश में रहने के बाद जब राहुल भारत वापस लौटे थे, तो उनके पास बताने लायक कुछ खास नहीं था। उनके नाम पर ऐसी कोई खास उपलब्धियां या पेशेवर कामयाबियां नहीं थीं, जो उल्लेखनीय हों या जिन पर वे इतरा सकें। बल्कि वे तेज-रफ्तार जिंदगी के शौकीन थे और उनकी एक कोलंबियाई गर्लफ्रेंड भी थी। चूंकि वे गांधी परिवार से वास्ता रखते थे, लिहाजा सियासत का कोई जमीनी अनुभव हासिल किए बगैर सीधे संसद पहुंच गए और पार्टी की अग्रणी जमात में भी शामिल हो गए। ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं कि उनका राजनीतिक कॅरियर मूर्खतापूर्ण जुबानी गलतियों, खराब फैसलों और संगठनात्मक सुधार के नाकाम प्रयोगों से भरपूर नजर आता है।

    पिछले काफी वक्त से कांग्रेस का जनाधार लगातार सिकुड़ रहा है और राहुल की निगरानी में पार्टी की यह सिकुड़न और तीव्र ही हुई है। लेकिन राहुल गांधी ने एक बार भी चुनावी पराजयों या संगठनात्मक कमजोरियों की जिम्मेदारी लेने की जहमत नहीं उठाई। बल्कि इसके लिए पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व और सरकार की गलतियों को जिम्मेदार ठहराया गया।

    बतौर सांसद भी राहुल का प्रदर्शन लोकसभा के अंदर व बाहर, दोनों जगहों पर कुछ खास नहीं रहा है। वे वर्ष 2014 में हुए पिछले आम चुनाव में अपनी परंपरागत अमेठी सीट को बरकरार रखने में जरूर सफल रहे, लेकिन उनकी जीत का अंतर काफी घट गया। कांग्रेस उपाध्यक्ष के तौर पर उनकी छवि ऐसी रही है कि उनसे मिलना सहज नहीं, उनकी सोच अस्पष्ट है और वे ज्यादा चीजों पर ध्यान नहीं देते। आखिर जो नेता के तौर पर खुद अपरिपक्व नजर आता हो और जिसकी मंडली में विदेशों में पढ़े-लिखे चुनिंदा लोग ही शामिल हों, जिनमें से किसी को भी जमीनी तौर पर पेश आने वाली चुनौतियों की समझ न हो, उसके साथ भला आम कांग्रेसियों का जुड़ाव सहज हो भी कैसे सकता था। ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं कि कांग्रेस को छोड़कर जाने वालों की तादाद बढ़ती गई।


    भले ही राहुल गांधी ने कांग्रेस को नया कलेवर देने का सपना देखा और वे इसे आधुनिक तकनीकी व भविष्यवादी विचारों से लैस युवा-संचालित संगठन बनाना चाहते हों, लेकिन उनके तुगलक लेन स्थित बंगले की दीवारों के बाहर तो वही पुराना ढर्रा दिखता रहा। राहुल ने कुछ अलग सोच रखने वाले नेता होने के भी कोई संकेत नहीं दिए। वे लगातार उसी एकसूत्री एजेंडे को दोहराते रहे कि भाजपा एक विभाजनकारी, समाज का ध्रुवीकरण करने वाली पार्टी है और हिंदू चरमपंथ राष्ट्र के लिए खतरा है। उनका देश से अचानक गायब होने सिलसिला भी जारी रहा और उनके बारे में यही लगता रहा कि वे आमजन से कटे हुए हैं।

    लेकिन इस साल से बदलाव शुरू हुआ, जब सोनिया गांधी पर यह दबाव बढ़ा कि वे पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए निर्णायक कदम उठाएं। इसके अलावा निर्वाचन आयोग ने भी यह साफ कर दिया कि कांग्रेस पार्टी को संगठनात्मक चुनाव करवाने ही होंगे। ऐसे में राहुल की ताजपोशी में और देर करने से पार्टी के भीतर विरोधी सुर भी उठ सकते थे। पार्टी का कोई विश्वसनीय चेहरा प्रतिद्वंद्वी के रूप में भी सामने आ सकता था। ऐसे में राहुल गांधी की ताजपोशी की तैयारी कर दी गई।


    खुद राहुल गांधी भी अब एक राजनेता के तौर पर कुछ बदले-बदले से नजर आ रहे हैं। पहले की अपेक्षा अब वे जनता के मिजाज को कहीं बेहतर ढंग से समझ रहे हैं। यह कोई रहस्य की बात नहीं कि आर्थिक मोर्चे पर एनडीए सरकार के नोटबंदी और जीएसटी जैसे साहसिक कदमों की वजह से जनता का रुख बदला हुआ है। इससे कांग्रेस को भी एक सजा-सजाया चुनावी मंच मिल गया, जहां पर राहुल गांधी रोजगार छिनने, करों का बोझ बढ़ने, अर्थव्यवस्था की नाकामी और कृषि क्षेत्र में बढ़ते संकट के नाम पर सरकार को लगातार घेरते हुए जनता का ध्यान आकर्षित करने में लगे हैं। उनके सार्वजनिक भाषणों में अब पहले से ज्यादा पैनापन नजर आता है, वहीं उनकी सोशल मीडिया टीम भी अधिक स्मार्ट हो गई है। एक कन्न्ड़ सिने-स्टार की अगुआई में राहुल की यह सोशल मीडिया टीम सरकार के खिलाफ लगातार हमले बोलते हुए तीखे कटाक्ष करती रहती है।


    हालांकि राहुल अब भी कभीकभार अपने भाषणों में पहले जैसी गलतियां करते रहते हैं। मसलन, कुछ दिन पूर्व ही आलू से सोना संबंधी उनका हास्यास्पद बयान चर्चा में रहा। लेकिन समग्र तौर पर देखें तो अब वे अर्थव्यवस्था की खामियों का जिक्र करते हुए कहीं ज्यादा विश्वसनीय नजर आते हैं। उन्होंने यह समझा कि भाजपा के मुकाबले उनका भारत के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव कमजोर नजर आता है। ऐसे में अब उन्होंने चतुराईपूर्वक अपनी ऐसी छवि बनाने की कोशिश की है कि वह धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने वाले सच्चे हिंदू हैं।


    बहरहाल, राहुल को अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इस वक्त एक चुनावी जीत की बेहद जरूरत है। उन्होंने अगर गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आने से पूर्व पार्टी अध्यक्ष बनने का विकल्प चुना तो इसका यही मतलब है कि कांग्रेस वहां अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है। हालांकि वे गुजरात चुनाव में प्रमुख विपक्षी प्रचारक नहीं हैं। यह सेहरा तो हार्दिक पटेल के सिर बंधता है। लेकिन वहां हार्दिक से अधिक राहुल की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। कांग्रेस गुजरात में बहुमत से चूक भी जाए, फिर भी उसे अच्छा प्रदर्शन तो करना ही होगा, तभी राहुल गांधी यह कह सकते हैं कि उनके नेतृत्व में पार्टी का भविष्य उज्ज्वल है। यदि एनडीए सरकार जीएसटी पर व्यापारियों की शिकायतें दूर करने और अर्थव्यवस्था को तीव्र विकास के पथ पर वापस लाने में सफल रहती है, तो हो सकता है कि राहुल को फिर यह मौका न मिले।


    दिक्कत यह है कि राहुल गांधी के पास कोई वैकल्पिक विजन व अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने का गेम-प्लान नहीं है। रोजगार सृजन के नाम पर वे बस उद्यमिता का मंत्र रटते रहते हैं। वहीं कृषि को लेकर वे फसलों के उचित प्रबंधन का वही पुराना फॉर्मूला दोहराते रहते हैं, मानो इससे किसानों की तमाम दिक्कतें दूर हो जाएंगी।


    इसके अलावा राहुल गांधी के समक्ष पार्टी के पुरानी व नई पीढ़ी के नेताओं के बीच संतुलन बैठाने की भी चुनौती है। उन्हें पार्टी युवा तुर्कों को समायोजित करने के अलावा व्यापक जनाधार रखने वाले वरिष्ठ नेताओं को भी साथ लेकर चलना होगा।


    याद कीजिए, राहुल गांधी ने एक बार कहा था - 'यदि भारत एक कंप्यूटर है तो कांग्रेस इसका डिफॉल्ट प्रोग्राम है। यदि ऐसा है तो कहना होगा कि वह प्रोग्राम करप्ट हो गया है और पार्टी को अपने इस सोर्स कोड को दोबारा लिखने की जरूरत है।


    (लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

    प्रतिक्रिया दें
    English Hindi Characters remaining


    या निम्न जानकारी पूर्ण करें
    नाम*
    ईमेल*
    Word Verification:*
    Please answer this simple math question.
    +=

      जरूर पढ़ें