चुनावी लड़ाई तेज होते ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 'चौकीदार चोर है का अपना जो नारा उछालना शुरू किया था, उसे वह किस हद तक ले गए, इसका एक प्रमाण गुरुग्राम की एक रैली में मिला। इस रैली में उन्होंने कहा कि सेना में काम करने वाले हरियाणा के जवानों के पैसे चोरी करके प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं अनिल अंबानी के खाते में तीस हजार करोड़ रुपए डाले। उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने नीरव मोदी के खाते में 45 हजार करोड़ रुपए और विजय माल्या के खाते में 10 हजार करोड़ रुपए डाले। राहुल गांधी की मानें तो प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मित्र उद्योगपतियों के लाखों करोड़ रुपए के कर्जे भी माफ कर दिए।

सभी जानते हैं कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री को भ्रष्ट बताने के लिए इसी तरह के भाषण एक अरसे से दे रहे हैं, लेकिन इसके सबूत देने की जरूरत नहीं समझ रहे कि आखिर कब और किस खाते से प्रधानमंत्री ने अनिल अंबानी या फिर नीरव मोदी अथवा विजय माल्या के खाते में पैसे डाले? अगर ऐसा हुआ, जैसा कि राहुल गांधी कह रहे हैैं तो इसके कोई सबूत भी तो होंगे। ऐसे कोई सबूत देने के बजाय राहुल गांधी प्रधानमंत्री को भ्रष्ट साबित करने के अपने अभियान में इसके बावजूद जुटे हैैं कि न तो सुप्रीम कोर्ट ने राफेल सौदे में गड़बड़ी की बात मानी और न ही नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (कैग) ने।

राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी को सिर्फ चोर ही नहीं बता रहे, बल्कि उनके खिलाफ इस तरह की बातें भी कर रहे हैं कि इसने चोरी की है... यह पकड़ा जाएगा...भाग जाएगा। ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे राहुल गांधी तब परेशान हुए, जब प्रधानमंत्री मोदी ने एक चुनावी रैली के दौरान यह कह दिया कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी मिस्टर क्लीन की छवि के साथ आए थे, लेकिन उनके जीवन का अंत 'भ्रष्टाचारी नंबर वन की तरह हुआ।

प्रधानमंत्री के इस बयान पर राहुल गांधी ने ट्वीट कर यह कहा कि मोदीजी, लड़ाई खत्म हो चुकी है, आपके कर्म आपका इंतजार कर रहे हैं। खुद के बारे में अपनी आंतरिक सोच को मेरे पिता पर थोपना भी आपको नहीं बचा पाएगा। मेरी ओर से ढेर सारा प्यार और झप्पी! लेकिन उन्होंने 'चौकीदार चोर है कहना नहीं छोड़ा। इसके बावजूद नहीं छोड़ा कि उन्हें इस गलतबयानी के लिए लिखित में माफी मांगनी पड़ी कि अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया कि चौकीदार चोर है। हैरत है कि सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर माफी मांगने के बाद भी राहुल 'चौकीदार चोर है का नारा लगवा रहे हैं।

दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी ने फिर से राजीव गांधी को निशाने पर लिया और उनकी ओर से आईएनएस विराट के जरिए छुट्टियां मनाने के विषय को उठा दिया। हालांकि नौसेना के कुछ पूर्व अधिकारियों ने कहा कि राजीव गांधी ने छुट्टियां मनाने के लिए नौसेना के युद्धपोत का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन कुछ ने माना कि इस्तेमाल किया था। इन परस्पर विरोधी दावों के बीच उस दौर की खबरें यही संकेत करती हैैं कि राजीव गांधी जब समुद्र तट पर छुट्टियां मनाने गए थे तो आईएनएस विराट की सेवाएं ली गई थीं। यह भ्रष्टाचार का प्रसंग तो नहीं, लेकिन नौसेना के अनावश्यक इस्तेमाल का मामला बनता है।

हालांकि लगता यही है कि अपने प्रति राहुल गांधी की अपमानजनक शब्दावली से आजिज आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजीव गांधी को निशाने पर लिया, लेकिन यह बहस का विषय तो है ही कि क्या उन्हें ऐसा करना चाहिए था? प्रधानमंत्री होने के नाते तो उन्हें कोई नई नजीर पेश करनी चाहिए थी। राजीव गांधी पर मोदी की टिप्पणी के बाद ऐसे तर्क दिए गए कि दिवंगत व्यक्तियों के खिलाफ कुछ नहीं कहा जाना चाहिए। इस तर्क को निराधार नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह किसी एक पक्ष पर लागू नहीं हो सकता। आखिर यह राहुल ही थे, जो कुछ समय पहले स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर को कायर और अंग्रेजों के पैर छूने वाला बता रहे थे। यह भी एक तथ्य है कि मनोहर पर्रिकर के निधन पर ऐसे बयान सामने आए कि वह राफेल सौदे का पहला शिकार बने।

यदि राहुल गांधी अपने और अपनों के लिए जैसा व्यवहार चाहते हैैं तो उन्हें दूसरों के लिए भी ऐसे ही अधिकार की वकालत करनी होगी। अगर राहुल और उनके सहयोगी यह मानते हैं कि बोफोर्स सौदे में कुछ गलत नहीं हुआ, तो इससे यह हकीकत छिपने वाली नहीं कि इस सौदे में दलाली की रकम के इधर-उधर होने के सबूत सामने आ गए थे। ऐसे सबूतों के कारण ही वर्ष 1989 के आम चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ा था।

बोफोर्स मामले में यह भी जगजाहिर है कि इटैलियन कारोबारी ओट्टावियो क्वात्रोच्चि को देश से रातोंरात भगाया गया और फिर स्वीडन सरकार से गुपचुप रूप से यह अनुरोध किया गया कि भारत सरकार इस मामले में जांच नहीं चाहती। यह अनुरोध करने वाले तत्कालीन विदेश मंत्री को आखिर इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

कांग्रेस चाहे जो दावा करे, सच यही है कि बोफोर्स सौदे की जांच ढंग से नहीं होने दी गई। इसी कारण सच्चाई की तह तक नहीं पहुंचा जा सका। कांग्रेस को यह भी याद रखना चाहिए कि बोफोर्स के अलावा उसके शासनकाल में हुए अन्य रक्षा सौदे भी संदेह के घेरे में आए। वीवीआईपी हैलिकॉप्टर सौदे का मामला तो अदालत में ही है।

इस चुनावी सीजन में यह समझ आता है कि कांग्रेस पार्टी राफेल सौदे को बोफोर्स सरीखा बनाना चाहती है, लेकिन उसकी मुश्किल यह है कि उसके पास इस सौदे में गड़बड़ी के कहीं कोई सबूत नहीं। यह सही है कि चुनाव के दौरान आरोप-प्रत्यारोप लगते हैं और कई बार भाषा की मर्यादा भी टूटती है, लेकिन यह साफ है कि इस बार भाषा की मर्यादा का कुछ ज्यादा ही उल्लंघन हो रहा है। इसके दुष्परिणाम तो सामने आने ही थे और वे राजनीतिक कटुता के रूप में दिख रहे हैं। लोकतंत्र की अपनी एक भाषा होती है। अगर उसके स्तर को लेकर सतर्क नहीं रहा जाएगा तो फिर तू तू-मैं मैं ही देखने को मिलेगी।

पता नहीं प्रधानमंत्री मोदी को चोर बताने और उसके जवाब में राजीव गांधी पर निशाना साधने से कांग्रेस और भाजपा को क्या हासिल होगा, लेकिन बेहतर यही होता कि इस सबसे बचा जाता और भ्रष्टाचार पर कोई सार्थक बहस होती। यह बहस इसलिए होनी चाहिए थी, क्योंकि भ्रष्टाचार अब भी देश की एक गंभीर समस्या है। मोदी सरकार में भले ही उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार नियंत्रित दिखा हो, लेकिन निचले स्तर का भ्रष्टाचार तो जस का तस है। ध्यान रहे कि इसी भ्रष्टाचार से आम आदमी त्रस्त है।

इसमें दो राय नहीं कि राहुल गांधी को यह बात चुभी होगी कि उनके दिवंगत पिता पर निशाना साधा गया, लेकिन क्या उन्होंने यह सोचा कि उनके अनर्गल आरोपों से प्रधानमंत्री को कैसा लगता होगा? यह संभव नहीं कि राहुल अपने विरोधियों के खिलाफ तो कुछ भी कहने का अधिकार रखना चाहें, लेकिन इसी के साथ यह भी चाहें कि उन्हें या उनके करीबियों के खिलाफ कुछ न कहा जाए। आज के दौर में लोकतंत्र में यह संभव नहीं।

(लेखक दैनिक जागरण समूह के सीईओ व प्रधान संपादक हैं)