हमारे राजनीतिक परिदृश्य में संभावनाओं, नेतृत्व एवं विकल्पों की बहुतायत है। इस बहुतायत से हम भलीभांति परिचित हैं और साथ ही इससे भी अवगत हैं कि हमारे पास धार्मिक नेतृत्व भी है, जो धर्म एवं हमारी परंपराओं के बारे में मार्गदर्शन देता रहता है। इन दोनों के मध्य एक बहुत बड़ा रिक्त क्षेत्र है, जो समाज का है। अपने यहां सामाजिक नेतृत्व का अकाल-सा है। समाज का एकीकरण किसी का लक्ष्य नहीं बना। जातियों के बीच बढ़ रहे विभाजन, सामाजिक वैमनस्य को किसी ने लक्षित नहीं किया। कबीर, तुलसी, नानक जैसे संत-महात्मा तो दूर, कोई राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर जैसा भी फिर नहीं आया जो जातीय भिन्न्ताओं, सामाजिक विषमताओं और कुरीतियों को संबोधित कर सके। जब लोकतांत्रिक राजनीति ने जातियों को स्वीकार्यता दे दी, तो कोई सामाजिक नेता जातीय सोच के विरुद्ध विद्रोह करने खड़ा नहीं हुआ। हमने देखा है कि आजादी के आंदोलन की आहट मात्र से ही 19वीं और 20वीं सदी में राजनीति ने बड़े नेता पैदा किए, लेकिन गांधीजी के अतिरिक्त कदाचित महामना मदन मोहन मालवीय ही ऐसे नेता बने जिन्होंने राजनीति के अतिरिक्त सामाजिक एजेंडे को भी आगे बढ़ाया। बाबासाहब आंबेडकर का लक्ष्य दलित समाज के दायरे से बाहर नहीं निकल सका। सामाजिक आजादी स्वतंत्रता आंदोलन का भूला हुआ एजेंडा है। समर्थ सामाजिक नेतृत्व न होने से विभाजनकारी प्रवृत्तियों की काट नहीं हो पा रही है। समग्र समाज किसी के एजेंडे में नहीं है। चूंकि सत्ता, पद और अधिकार का लक्ष्य सामने दिखता है, इस कारण राजनीति सर्वाधिक आकर्षक क्षेत्र बन जाती है। राजनीति के लिए व्यक्ति वोटर है। धर्माधिकारियों के लिए व्यक्ति अनुयायी है। आखिर वह समाज ही है जो व्यक्ति, परिवार की चिंता करता है, लेकिन हमारा समाज व्यक्ति को नहीं जातियों, संप्रदायों में देखता है।


सेवानिवृत्त आईपीएस अफसर मनोज कुमार ने हिंदू धर्म के सामाजिक पक्षों, विषेषकर वर्ण व्यवस्था के जातीय पक्ष पर यह जायज-सा सवाल उठाया है कि क्या वर्ण व्यवस्था हिंदू धर्म का आवश्यक अंग है? यदि है तो फिर जाट, गूजर, कुर्मी रेड्डी, नायर आदि किस वर्ण में स्थान पाते हैं? इन्हें क्षत्रिय या किसी वर्ण में क्यों नहीं स्थान दिया गया? यही स्थिति भूमिहार और अन्य अनेक जातियों की भी है। अगर वर्ण व्यवस्था हिंदू धर्म का आवश्यक अंग है तो वे जिनका वर्ण नियत ही नहीं हुआ, क्या वे हिंदू नहीं हैं? वैदिक समाज में तो कर्म आधारित वर्ण विभाजन था। यह जातियों में कैसे रूढ़ हो गया? ऋग्वेद में शूद्र वर्ण का विवरण नहीं है। उसमें जातियां भी नहीं हैं, फिर जातियों का इतना प्रभुत्व हो जाना धर्मसम्मत कैसे हुआ? जो अपना विस्तार नहीं कर सकता, अन्य समाजों को सम्मिलित नहीं कर सकता, वह धर्म संपूर्ण दक्षिण क्षेत्र, सुदूर पूर्व श्रीविजय साम्राज्य एवं पश्चिम में गांधार तक आखिर फैला कैसे? ऐसे बहुत से सवाल धर्माधिकारियों से बनते हैं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलता। फिर समझ आता है कि दरअसल जवाब देने वाला ही कोई नहीं है। ऐसा लगता है कि सनातन धर्म के उदात्त एवं समावेशी विचारों के बावजूद हमारे धर्म के नियंता इन सवालों के जवाब देने को तैयार नहीं हैं। आवश्यक यह है कि समाज स्वयं निर्णय ले, क्योंकि अगर कुछ नहीं किया गया तो जातीय विषमता की नागिन हमारे राष्ट्र को अनंतकाल तक डसती रहेगी।


जातियों के विभाजन का समापन एकात्म भारत की प्राथमिक जरूरतों में से एक है। सवाल फिर आता है कि नेतृत्व के अभाव में समाज यह निर्णय ले तो कैसे ले? जातियां अपने-अपने नेता बना रही हैं। जातीय पंचायतों में कहीं मोबाइल, कहीं जींस, कहीं डीजे आदि प्रतिबंधित करने जैसी कार्रवाईयां हो रही हैं। चूंकि पंचायतें जातीय हैं इसलिए वे सामाजिक विभाजन की विभीषिका को संबोधित भी नहीं कर सकतीं। विभिन्न् समाजों को जमीनी सच्चाइयों को स्वीकार करते हुए स्वयं के बनाए दायरों को ताेडना होगा। प्रत्येक व्यक्ति, परिवार और समाज का दायित्व है कि अपने परिवेश को परिवर्तित करने का प्रयास करे। हमारा 'लक्ष्य सामाजिक ऊर्ध्वगामिता की दिशा में होना चाहिए। अगर हम दलित, आदिवासी अथवा पिछड़े समाज के अंग हैं तो सीमाओं को ध्वस्त करते हुए आगे चलें। सामाजिक एकीकरण की शुरुआत कहीं से तो करनी ही होगी। एकीकरण की प्रक्रिया के प्रस्थान बिंदुओं की कमी नहीं।


हिंदू खत्री एवं सिख अलग धर्म में हैं, लेकिन उनके बीच शादी-विवाह एक सामान्य सी बात है। एक धर्म के अंदर की जातियों में तो कोई समस्या ही नहीं होनी चाहिए। महानगरों में जातीय वर्जनाएं टूट रही हैं। युवाशक्ति में बदलाव की सोच प्रबल है। हमारे महानगर विकास के साथ जातीय दीवारों को तोड़ने का भी कार्य कर रहे हैं। नगरीकरण का विस्तार भी इस सामाजिक समस्या को समाधान देता है। राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज आंदोलन द्वारा बंगाल में जातीय विभाजन के समापन की दिशा में किया गया कार्य संपूर्ण देश के लिए आदर्श है। आज बंगाल में कुलीन कायस्थों और ब्राहमणों में प्राय: विवाह हो रहे हैं। मुखर्जी, गांगुली एवं बोस, मजूमदारों आदि भिन्न् जातियों में विवाहों पर बंगाल का सुसंस्कृत समाज आपत्ति नहीं करता। शिक्षा संस्कार का महत्व जातियों से अधिक है। इसी कारण बंगाल के चुनावों में जातियां गौण हैं। परंपरागत लीक से हटकर समाज के एकीकरण, समरसता का वातावरण बनाने का समय हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। कभी स्वामी श्रद्धानंद ने इस दिशा में महती प्रयास किया था। आर्य समाज का तो लक्ष्य ही इन सामाजिक विसंगतियों के समापन का था। हालांकि दलित समाज में वर्जनाएं कायम हैं, फिर भी बौद्ध सभाएं इस दिशा में प्रयास कर रही हैं एवं अनुसूचित समाज की प्रमुख जातियों विशेषकर जाटव, पासी आदि में आपसी विवाहों की संख्या बढ़ रही है। जातीय रूढ़ता के विरुद्ध अगर समग्र समाज नहीं, तो कम से कम समानधर्मी जातियों के एकीकरण की बात तो की जा सकती है। क्यों न समान पेशा और समान

सामाजिक-आर्थिक हैसियत वाली अधिकाधिक जातियां एकीकरण की दिशा में आगे बढ़ें? ठीक वैसे ही जैसे उत्तर प्रदेश में क्षत्रिय एवं कुर्मी समाज के सामाजिक सामंजस्य के लिए क्षत्रिय-छत्रपति मंच के जरिए एक पहल हुई। सामाजिक रूप से दोनों समाजों में काफी निकटता है। दोनों को मिलाकर शक्ति और कर्मठता का एक संयुक्त क्षेत्र बनता है। छत्रपति शिवाजी और सरदार पटेल से प्रेरित कुर्मी समाज क्षत्रिय समाज के साथ सामाजिक संबंधों की दिशा में चल सकता है। ऐसा ही अन्य जातियों के बीच भी हो सकता है। ऐसा होने पर दहेज की विभीषिका से निपटना आसान हो सकता है। जातीय बंधन इस समस्या को और विकट बना रहे हैं।


यथास्थितिवादी सोच नई जमीन नहीं तोड़ती, वरन विषमताओं को आश्रय देती है। ऐसी सोच खंडित देश में भी अपना भविष्य खोजने लगती है। यथास्थितिवाद की सुविधाजीवी सोच कभी राष्ट्र निर्माण का बीड़ा नहीं उठाती। बंगाल का क्रांतिधर्मी उदाहरण सामाजिक एकीकरण की मुहिम में एक प्रकाश स्तंभ के समान है। जातियां रहेंगी तो ऊंच-नीच की भावना भी रहेगी। जातीय बाधाएं राष्ट्र की रचनात्मक शक्ति का अपव्यय करती हैं। राष्ट्रीय एकीकरण के यज्ञ की पूर्णाहुति तब होगी, जब समाज जातीय विभाजन को ध्वस्त कर वृहद सामाजिक एकीकरण की दिशा में बढ़ेगा।


(लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। ये उनके निजी विचार हैं)