अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन की 125 पन्‍नों की एक हालिया रिपोर्ट में चीन की बढ़ती सामरिक शक्ति पर चिंता व्यक्त की गई है। इसके साथ ही बीजिंग दुनिया में आर्थिक साम्राज्यवाद की मुहिम भी चला रहा है। इसके लिए वह गरीब और विकासशील देशों को कर्ज के जाल में फंसाकर उनकी जमीन कब्जाने की जुगत में है। उन देशों के बाजार और कच्चे माल की आपूर्ति के लिए उनके संसाधनों पर भी चीन की नीयत खराब है। उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका से लेकर योरप, अफ्रीका और एशिया तक दुनिया के हर कोने में चीन अपने पैर पसार रहा है। चीन के उभार के चलते बीते कुछ वर्षों में अमेरिका को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ा है। गत वर्ष जारी अमेरिकी राष्ट्रीय रक्षा रणनीति में रूस और चीन के साथ कड़ी प्रतिस्पर्द्धा की अहमियत पर जोर दिया गया था। इसमें दावा किया गया कि चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति और रूस की आक्रामकता ने दुनिया भर में अमेरिकी सैन्य बढ़त को कमजोर किया है। सैन्य मोर्चे पर चीन के भारी खर्च से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी बड़ी चुनौतियां उत्पन्न् हो रही हैं। आधिकारिक रूप से बीजिंग रक्षा पर 157 अरब डॉलर खर्च कर रहा है, जबकि अमेरिका का रक्षा बजट अभी भी 602 अरब डॉलर है। वहीं भारत ने भी 2017 में रक्षा पर 52 अरब डॉलर खर्च किए। इस खर्च का दूसरा पहलू भी है। अगर विनिमय दरों की तुलना से इतर वास्तविक सैन्य खर्च की बात करें तो यह काफी ज्यादा होगा।

अमेरिका को चीन की सैन्य चुनौती अभी तक केवल पश्चिमी प्रशांत महासागर तक ही सीमित थी, लेकिन बीजिंग अब ऐसी क्षमताएं हासिल करने में जुटा है कि उसकी सैन्य शक्ति के दायरे का क्षेत्रीय पड़ोसियों से परे तक विस्तार हो। बीजिंग ने पांचवीं पीढ़ी का उन्न्त लड़ाकू विमान, एंटी शिप बैलिस्टिक मिसाइल व डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के निर्माण की क्षमताएं हासिल कर ली हैं। अपनी अन्य ताकतों के साथ ही इन सबसे बीजिंग को न केवल पूरब और दक्षिण-पूर्व एशियाई पड़ोसियों पर बढ़त हासिल हो जाती है, बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए अमेरिकी हस्तक्षेप की राह रोकने में भी वह सक्षम हो गया है। ऐसे में अगर ताइवान या अमेरिका के दूसरे सहयोगियों का चीन के साथ संघर्ष छिड़ता है तो उनकी रक्षा के लिए अमेरिका के समक्ष चुनौती और कड़ी होगी।

चीन ने बाइडू-3 सैटेलाइट के सफल प्रक्षेपण के साथ ही अपने अंतरिक्ष आधारित नेविगेशन सिस्टम को बहुत दुरुस्त बना लिया है। इससे वह दुश्मन के ठिकानों पर बहुत बारीकी से निशाना लगा सकता है। चीनी सेना अब युद्ध के मैदान में वर्चस्व बना सकती है। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान से लेकर लंबी रेंज की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों के साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग के मिश्रण से चीन ने सैन्य मोर्चे पर ऐसी तरक्की की है, जिसने दुनिया के सामने एक गंभीर खतरा पैदा कर दिया है।

चीनी नौसेना में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेल गन के रूप में एक बेहद मारक हथियार जोड़ा गया है। इसे 'सुपरगन का नाम भी दिया जा रहा है। यह हवा में भी बेहद तेजी और अचूकता के साथ निशाना लगा सकती है तो एयरक्राफ्ट मिसाइल को काफी दूर से ही सटीकता के साथ ध्वस्त कर सकती है। अपने शक्तिशाली वार से यह किसी जहाज को भी डुबो सकती है। चीन की हाइपरसोनिक मिसाइल भी लक्ष्य से भटके बिना ही 5,000 किमी प्रति घंटे की रफ्तार की गति से उड़ान भर सकती है। हथियार प्रणाली अधिकांश मिसाइलों में सेंध लगाने में सक्षम है। चीन की ताकत इतनी बढ़ गई है कि वह जिस देश पर हमला करेगा, उसे संभलने का मौका भी नहीं देगा। वह उस देश की चेतावनी प्रणाली और मिसाइल रक्षा तंत्र को भी तहस-नहस कर सकता है।

दक्षिण चीन सागर में भी चीन दूरदराज के इलाकों में मिसाइल शेल्टर, अत्याधुनिक सेंसर और रडार सिस्टम से लैस सैन्य सुविधाओं वाली चौकियां विकसित कर रहा है। पानी के भीतर निगरानी के लिए भी उसने नई तकनीक ईजाद की है। इसके दो फायदे हैं। एक तो चीनी पनडुब्बियों को लक्ष्य पर निशाना लगाने में सहूलियत होगी तो चीन के सामुद्रिक रेशम मार्ग को भी सुरक्षा मिलेगी। जहाजों, उपग्र्रहों और जलमग्न ग्लाइडरों के उपयोग से यह प्रणाली दक्षिण चीन सागर और हिंद-प्रशांत महासागर में जल के भीतरी परिदृश्य से जुड़े तमाम आंकड़े जुटा सकती है।

विदेशों में किया चीनी निवेश भी अब फलीभूत हो रहा है। व्यापक वैश्विक मौजूदगी के लिए आतुर चीन को इससे दूसरे देशों में नौसैनिक बंदरगाह बनाने का अवसर मिला। चीनी रणनीतिकार इस पर भी विचार कर रहे हैं कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र और उत्तर-पूर्वी अफ्रीका में अपने सैन्य प्रभुत्व को कैसे भुनाए, जिनसे फारस की खाड़ी जैसे उसके प्रमुख जलमार्गों का सीधा सरोकार है। ये चीन की सामुद्रिक जीवनरेखा की धुरी माने जाते हैं। वहीं व्यापार और अवसंरचना से जुड़ी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना का भी यही मकसद है, जिसमें चीन को एशिया और योरप से जोड़ना है।

इससे चीन को अपने सागर तट से हजारों मील दूर तस्करों से निपटने, संकट से उबरने और नौसैनिक अभ्यास में मदद मिलेगी। आर्कटिक महासागर, बाल्टिक सागर और अन्य तमाम सुदूरवर्ती जलमार्गों तक उसकी पैठ बढ़ी है। चीनी नौसेना भी बेहद सक्षम विमानवाहक पोत विकसित करने में जुटी है। इससे वैश्विक शक्ति संतुलन में पलड़ा भी चीन की ओर झुकेगा। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण जिबूती में भी चीन का पहला विदेशी सैन्य अड्डा शुरू हो चुका है। बीजिंग आर्थिक शिकंजे और आक्रामक कूटनीति का भी सहारा ले रहा है। पाकिस्तान के खस्ता आर्थिक हालात का भी चीन भरपूर लाभ उठा रहा है, जिसे उसने एक तरह से अपनी जागीर बना लिया है। भारत के साथ दुश्मनी का साझा भाव भी इन दोनों देशों को करीब लाया है। भारत के पड़ोसी देशों में भी भारी निवेश के जरिए चीन उन्हें लुभाने में जुटा है। चीन के अधिकांश पड़ोसी उसके वर्चस्व के आगे मौन हैं। वहीं अपने आकार, आबादी और अन्य पैमानों के आधार पर भारत ही उसे चुनौती देने में सक्षम है। भारत को असल में नेहरू के दौर से चली आ रही समाजवादी नीतियों का खामियाजा भुगतना पड़ा। उनके चलते भारत चीन से पिछड़ता गया जबकि 1980 के दशक में भारत का जीडीपी चीन से अधिक था। भारत के पास सैन्य तैयारियों के लिए वित्तीय संसाधनों का अभाव है।

जहां चीन पांचवीं पीढ़ी का उन्न्त लड़ाकू विमान बनाकर मारक हथियारों का जखीरा बढ़ा रहा है, वहीं भारतीय वायु सेना की न्यूनतम जरूरत को पूरा करने के लिए राफेल विमान खरीद को ही कुछ नेता अटकाने में अड़े हैं। ऐसे नेताओं के इरादों पर पानी फेरने हेतु जनता को आगे आना होगा, ताकि भारत सैन्य व आर्थिक रूप से सशक्त बन सके। देश के अस्तित्व के सामने सियासत का कोई मोल नहीं होना चाहिए।

(लेखक सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर हैं)