अगर कैलिफोर्निया एक स्वतंत्र राष्ट्र होता तो यकीनन आज की तारीख में वह हमारा एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक सहभागी होता। पिछले साल अकेले कैलिफोर्निया से हमने 5.3 अरब डॉलर की वस्तुओं का आयात किया। भारत कैलिफोर्निया से आईटी सेवाओं का व्यापार तो करता ही है, वह उसे काजू, कॉफी, चाय, इंजिन पार्ट्स, चावल, सब्जियां, स्क्रू आदि भी बेचता है। आज कैलिफोर्निया में 4 लाख 75 हजार से अधिक भारतीय बसे हैं। वह हमारी टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री से गहरे तक जुड़ा हुआ है। खासतौर पर सिलिकॉन वैली की कंपनियों ने गत 20 वर्षों में भारत में भारी निवेश किया है। ये कंपनियां आज लाखों भारतीयों को किसी न किसी रूप में रोजगार मुहैया करा रही हैं। वास्तव में बेंगलुरू का टेक्नोलॉजी सेक्टर अमेरिका से इस हद तक जुड़ा हुआ है कि वहां के लोग अकसर मजाक में कहते हैं कि जब अमेरिका में सार्वजनिक छुट्टियां होती हैं तो बेंगलुरू में भी ट्रैफिक की रफ्तार सुस्त पड़ जाती है।

ऐसे में भारत के टेक्नोसैवी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगर अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान खुद को न्यूयॉर्क-वॉशिंगटन डीसी के सुपरिचित दायरे तक सीमित रखने के बजाय कैलिफोर्निया और सिलिकॉन वैली की यात्रा करने का निर्णय लिया तो यह स्वाभाविक ही था। यहां मोदी दुनिया के शीर्ष निवेशकों और बिजनेस लीडर्स से व्यक्तिगत रूप से मिले। यह भारत को एक इंवेस्टमेंट डेस्टिनेशन के रूप में प्रचारित करने की दिशा में बहुत अच्छा कदम था, क्योंकि इस क्षेत्र में भारत चीन, पूर्वी एशिया और पूर्वी यूरोप से कड़ी प्रतिस्पर्धा कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'डिजिटल इंडिया" अभियान पर भारत में चाहे जितने सवाल उठाए जा रहे हों, मोदी के लिए यह बहुत अहम है, क्योंकि इसकी मदद से उन्हें दुनिया के कुछ सबसे प्रभावशाली टेक्नोलॉजी लीडर्स से जुड़ने का मौका मिलता है और मिल रहा है। अपने व्यक्तिगत करिश्मे और बोलने के हुनर के चलते मोदी भारत की कहानी के एक बेहतरीन सेल्समैन और मार्केटर साबित होते हैं।

साथ ही, हमारे कारोबारियों के उलट कैलिफोर्निया या अन्य स्थानों के विदेशी बिजनेस लीडर्स बिना किसी लाग-लपेट के मोदी को यह बता सकते हैं कि उन्हें भारत में व्यापार करने में क्या बुनियादी कठिनाइयां पेश आती हैं। इन बेबाक प्रतिक्रियाओं से मोदी को फायदा ही होगा, बशर्ते वे नई दिल्ली लौटकर गंभीरता से इन तमाम मुश्किलों का हल करने में जुट जाएं।

लेकिन सवाल उठता है कि मोदी की सिलिकॉन वैली यात्रा देश के लिए नया क्या कर सकती है। यह तो एक जाना-माना तथ्य है कि भारत के पास सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी प्रतिभाओं की कमी नहीं है। उसके पास एक बड़ा बाजार भी है, जो उसे निवेशकों के आकर्षण का केंद्र बनाता है। लेकिन नौकरशाही की बाध्यताओं के चलते ऐसा हो नहीं पाता। मिसाल के तौर पर जटिल कर प्रणालियां निवेशकों की राह में रोड़े पैदा करती हैं। लालफीताशाही और भ्रष्टाचार की भीषण समस्याएं हैं। अनुबंधों के प्रवर्तन की दयनीय दशा इसका महज एक पहलू है। बुनियादी ढांचे और सुविधाओं की भी दिक्कतें पेश आती हैं। भूमि अधिग्रहण और श्रम सुधारों की समस्याएं तो खैर जगजाहिर हैं ही।

निश्चित ही, मोदी इन तमाम मुसीबतों से भलीभांति वाकिफ हैं। निवेशकों से हुई अपनी चर्चा में उन्होंने उन्हें इनके समाधान के लिए आश्वस्त भी किया होगा। चूंकि यह प्रधानमंत्री के रूप में उनकी पहली कैलिफोर्निया यात्रा थी और उन्हें प्रधानमंत्री बने भी अभी सवा साल ही हुआ है, इसलिए अभी उनकी सुनी भी जा रही है। लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरता जाएगा, निवेशकों की बेसब्री भी बढ़ सकती है। वास्तव में उन्होंने अपनी निजी विश्वसनीयता को दांव पर लगा दिया है और अब उन्हें नतीजे देना ही होगा। यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि दिल्ली के ढर्रे को बदलना बहुत दुष्कर है। अभी तक तो ऐसा कुछ होने के आसार नहीं नजर आ रहे। हद तो तब हो जाती है, जब एक तरफ प्रधानमंत्री डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने की बात करते हैं और दूसरी तरफ उनकी सरकार नेशनल इन्क्रिप्शन पॉलिसी जैसे आत्मघाती कदम उठाती है। यहां गौरतलब है कि यूपीए सरकार द्वारा लागू किए गए आईटी नियमों को हटाने की दिशा में भी सरकार द्वारा अभी तक कुछ नहीं किया गया है। मोदी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि सेकंड जनरेशन रिफॉर्म्स को गति देने के लिए वे क्या कदम उठाएं, क्योंकि देश में आर्थिक सुधारों का विधायी उपाय अवरुद्ध हो गया है।

अपनी कैलिफोर्निया यात्रा के दौरान मोदी के मन में यह विचार भी अवश्य ही आया होगा कि आखिर क्या कारण है, जो सिलिकॉन वैली गूगल, फेसबुक, टेल्सा जैसी वैश्विक मानस बनाने वाली कंपनियों को जन्म देती है। वहां पर बहुतेरे स्टार्टअप्स दुनिया को अपनी मुठ्ठी में करने के इरादे से ही काम शुरू करते हैं। उनके पास नए विचार और बड़े सपने होते हैं। निश्चित ही, उनका आर्थिक परिवेश भी उनकी पूरी मदद करता है, लेकिन हमारे यहां इतने बड़े सपने कोई नहीं देखता। हमारे उद्यमी देश के दायरे में रहकर ही सोचते हैं और उनकी कल्पनाशक्ति सरहदों को नहीं लांघ पाती।

निश्चित ही, दिल्ली की नौकरशाही भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है, लेकिन हमारे उद्यमियों के साथ माइंडसेट की भी समस्या है। हम अकसर कूपमंडूक की तरह बर्ताव करते हैं। एक तरफ एलन मस्क हैं, जो पूरी दुनिया के ट्रैवलिंग के तौर-तरीकों को बदल देना चाहते हैं, मनुष्यों के अंतरिक्ष में जाने तक की प्रणाली में बदलाव कर देना चाहते हैं, दूसरी तरफ हमारे यहां ऐसे कोई बड़े और दु:साहसी विचार ही नहीं हैं। यदि मोदी सिलिकॉन वैली से कुछ सीख सकते हैं तो वह यही है कि किस तरह हमारे सबसे सक्षम और प्रतिभाशाली लोगों को नए विचारों और नई कल्पनाओं के लिए प्रेरित कर सकें, उन्हें अपने दिमाग के दायरे को बढ़ाकर नई और अप्राप्त उपलब्धियों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकें।

जो लोग मोदी की विदेश यात्राओं की आलोचना करते हैं, वे यह बात भूल जाते हैं कि वास्तव में मोदी विदेशों में भारत की एक छवि बनाने का महत्तम कार्य कर रहे हैं। इसके बजाय हमें तो इस पर विचार करना चाहिए कि क्या उनकी सरकार उनकी आकांक्षाओं के साथ कदमताल करने के लिए तैयार है?

(लेखक सूचना प्रौद्योगिकी के जानकार हैं)