कठुआ में एक आठ साल की बच्ची से दुष्कर्म मामले को लेकर जो घटनाक्रम सामने आ रहा है, उससे ऐसा लगता है कि मानो दिल्ली में 'लुटियंस लॉबी और राजनीतिक प्रतिष्ठान अचानक नींद से जागे हों। क्या जम्मू-कश्मीर के कठुआ में एक बच्ची के साथ हुए संगीन अपराध को हिंदू-मुस्लिम चश्मे से देखा जाना चाहिए? जिस दरिंदगी से इस आठ वर्षीय मासूम की हत्या हुई, वह किसी भी सभ्य समाज में निर्विवाद रूप से अस्वीकार्य और असहनीय है। कठुआ कांड के दोषियों को कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए। इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह वक्तव्य देश की मूल भावना को प्रकट करता है कि बच्चियों के गुनहगार बख्शे नहीं जाएंगे, किंतु इस पूरी घटना में राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से एक विचित्र बात उभरकर सामने आई है। दिल्ली में कठुआ सहित उन्न्ाव दुष्कर्म मामले के विरोध में 12 अप्रैल को इंडिया गेट पर कांग्र्रेस ने कैंडल मार्च निकाला, जिसमें पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी सहित कई शीर्ष नेता शामिल हुए। प्रियंका वाड्रा और उनके पति रॉबर्ड वाड्रा भी इसका हिस्सा बने। दिल्ली में विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने भावनात्मक ट्वीट करते हुए लिखा, 'मारी गई बच्ची के लिए हम इंसान के रूप में नाकाम रहे। जो लोग अपराधियों को धर्म की आड़ में शरण देना चाहते हैं, उन्हें यह पता होना चाहिए कि वे भी अपराधियों की ही श्रेणी में गिने जाएंगे।


इन्हीं दोनों सियासी दलों के बोल, दिल्ली से 600 किमी दूर जम्मू आते-आते बदले हुए नजर आते हैं। कठुआ में पुलिस की जांच से असंतुष्ट स्थानीय हिंदू संगठन आंदोलित हैं। उनकी मांग है कि सीबीआई इस मामले की जांच करे। ऐसी ही मांग आरोपितों के परिवार के लोग भी कर रहे हैं। इसी मांग को लेकर जम्मू बार काउंसिल के अध्यक्ष बीएस सलाठिया के नेतृत्व में सैकड़ों वकील सड़क पर प्रदर्शन करते हैं और आरोप-पत्र दाखिल होने से रोकने का भी प्रयास करते हैं। सलाठिया राज्यसभा में कांग्र्रेस के नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद के मुख्य चुनावी एजेंट होने के साथ-साथ कांग्रेस से जुड़े रहे हैं। पीड़ित परिवार की अधिवक्ता डीएस राजावत ने सलाठिया पर धमकाने का आरोप भी लगाया है। जम्मू में भाजपा के नेता और राज्य सरकार में मंत्री लाल सिंह और चंद्र प्रकाश सिंह भी सीबीआई से जांच कराने हेतु निकाली गई एक रैली में शामिल होते हैं, फिर कुछ दिन बाद मंत्री पद से इस्तीफा दे देते हैं। क्या कारण है कि जम्मू में भाजपा-कांग्रेस के नेता घटना की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं तो दिल्ली में इन्हीं दलों के प्रतिनिधि जम्मू से विपरीत भाषा बोल रहे हैं? क्यों दिल्ली और जम्मू में एक ही राजनीतिक दलों की भावनाओं में एकरूपता नहीं है? इस विरोधाभास का कारण क्या है?

क्या कठुआ मामले में गिरफ्तार आरोपियों को बचाने का प्रयास हो रहा है? जम्मू से लगभग 1,100 किमी दूर उन्न्ाव में एक दुष्कर्म पीड़िता स्थानीय पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर सीबीआई जांच की मांग करती है जिसके स्वीकार होने और न्यायिक हस्तक्षेप के बाद आरोपित विधायक गिरफ्तार भी हो जाता है। अब यदि उन्न्ाव के मामले में सीबीआई जांच की मांग उचित है तो फिर कठुआ के मामले में यह गलत कैसे हुई? इस पूरे घटनाक्रम से लगभग अनभिज्ञ स्वयंभू सेक्युलरिस्ट और उदारवादी-प्रगतिशील वर्ग तब तक नहीं चेता, जब तक जम्मू में हिंदू संगठनों और वकीलों ने सीबीआई जांच की मांग को लेकर प्रदर्शन नहीं किया। इस जमात ने घटनाक्रम से संबंधित तथ्यों को तोड़-मरोड़कर अपने अनुकूल एक ऐसे विमर्श का निर्माण किया जिसने सीबीआई जांच की मांग को 'हिंदू बनाम मुस्लिम बता दिया। इतना ही नहीं, सीबीआई जांच की मांग को आरोपितों को बचाने वाली मांग के तौर पर देखा गया। आखिर सीबीआई जांच की मांग को सांप्रदायिक कैसे कहा जा सकता है? सवाल यह भी है कि क्या हत्या और दुष्कर्म की सभी घटनाओं में पीड़ित और अपराधी की पहचान वैसे ही उजागर की जाती है, जैसे कठुआ के मामले में की गई?


वास्तव में स्वयंभू सेक्युलरिस्टों के लिए किसी भी अपराध की गंभीरता पीड़ित-आरोपी की मजहबी पहचान से निर्धारित होती है। जहां निर्भया की असली पहचान से देश कई महीनों तक अनजान रहा, वहीं कठुआ में मासूम की मुस्लिम और आरोपियों की हिंदू पहचान को तुरंत क्यों सार्वजनिक कर दिया गया? कहीं इसलिए तो नहीं, ताकि मामले को हिंदू-मुस्लिम रंग दिया जा सके? सवाल यह भी है कि क्या जम्मू-कश्मीर में पहली बार किसी अहम घटना को 'हिंदू बनाम मुस्लिम दृष्टिकोण से देखा गया है? दिल्ली और जम्मू के स्थानीय व राजनीतिक प्रतिष्ठानों की भाषा में अंतर्विरोध का एकमात्र कारण जम्मू-कश्मीर के अतीत में मिलता है। क्या यह सत्य नहीं कि बीते कई दशकों में जम्मू-कश्मीर में हर बड़ा सार्वजनिक निर्णय और साथ ही अपराध की हर बड़ी घटना को हिंदू-मुस्लिम चश्मे से ही देखा गया है? क्या संविधान में धारा 370 को शामिल करने का कारण जम्मू-कश्मीर का मुस्लिम बहुल राज्य होना नहीं? 1980-90 के दशक में घाटी से करीब पांच लाख कश्मीरी पंडित अपनी पैतृक भूमि से पलायन के लिए मजबूर हुए, क्योंकि वे मुस्लिम नहीं थे। उन्हें अपने पड़ोसियों, स्थानीय पुलिस, जिलाधिकारी व अन्य न्यायिक संस्थाओं से इसलिए सहायता नहीं मिली, क्योंकि उनका धर्म इसके आड़े आ रहा था। उसी दौरान जब घाटी में ऐतिहासिक मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, पंडितों को उनके घरों से खदेड़कर गोलियों से भूना जा रहा था और उनकी महिलाओं के साथ दुष्कर्म किया जा रहा था, क्या तब कश्मीर का शेष समाज चुप नहीं रहा? क्या यह सत्य नहीं कि सेना से मुठभेड़ के समय सीमापार से आए आतंकियों को इसलिए स्थानीय लोगों से सहायता आसानी से मिल जाती है, क्योंकि दोनों की मजहबी पहचान साझा है? यह भी किसी से छिपा नहीं कि कश्मीर में पुलिसकर्मी इसलिए निशाने पर रहते हैं, क्योंकि स्थानीय मुस्लिमों का एक वर्ग उन्हे भारत के प्रतिनिधि के तौर पर 'काफिर मानता है। जिस प्रदेश में आतंकियों को बचाने के लिए स्थानीय लोग मजहब की आड़ में सुरक्षा बलों पर पथराव करते हों, वहां के एक मामले में सीबीआई जांच की मांग सांप्रदायिक कैसे हो गई?


दरअसल जम्मू-कश्मीर में सांप्रदायिक विकृति का बीजारोपण 1931 में तब हुआ, जब शेख अब्दुल्ला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई करके घाटी लौटे थे। जिस मजहबी बीज को शेख ने कश्मीर में अपने स्वार्थ के लिए अंकुरित किया, वह विषबेल बनकर दशकों पहले इस भूखंड की मूल संस्कृति को विस्मृत कर इस्लामी पहचान को स्थापित कर चुका है। नि: संदेह कठुआ की मासूम बच्ची को न्याय और दोषियों को कठोरतम दंड मिलना चाहिए, परंतु जब 70 वर्षों से जम्मू-कश्मीर में हर छोटे-बड़े मामले को हिंदू-मुस्लिम नजरिये से ही देखा गया हो, तब यदि कठुआ मामले में भी ऐसा ही हो रहा है, तो आश्चर्य क्यों?


(लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य तथा वरिष्ठ स्तंभकार हैं)