स्पर्श एक अनुभव है, अनुभूति है, वस्तु के प्रति आत्मबोध है। वैसे तो स्पर्श का अर्थ है किसी वस्तु को छूना, लेकिन इस छूने में जो अनुभव है, वह स्पर्श का मूल अर्थ बताता है। स्पर्श मूलत: किसी वस्तु के संपर्क से उत्पन्न् होता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि संगति के संपर्क से मन में काम की उत्पत्ति होती है, लेकिन यहां स्पर्श-बोध का विशेष अर्थ के रूप में प्रयोग किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने 'संजायते शब्द का प्रयोग किया है, यानी जब हमारी मनोदशा किसी से टकराती है या मन के भावों का कहीं प्रतिरोध होता है, तभी मन में विकार उत्पन्न् होता है।


मनोवैज्ञानिक स्पर्श की गहन व्याख्या करते हुए कहते हैं कि स्पर्श के अनेक प्रकार होते हैं। एक साधारण-सा स्पर्श कई दिशाओं में अर्थ की अभिव्यक्ति करता है। जब हम पत्नी का स्पर्श करते हैं, तो एक अलग बोध होता है, पुत्री को स्पर्श करते हैं तो मन में अलग भाव होता है और माता-पिता के चरण छूते हैं तो एक अलग दिव्यता का बोध होता है। अब प्रश्न उठता है कि स्पर्श तो एक ही है, लेकिन उसके अनुभव में इतनी विभिन्न्ताएं क्यों हैं? यही बोध है। बोध की अनुभूति चेतन मस्तिष्क से होती है। लेकिन जब हमारा बोध, हमारी दृष्टि और हमारी चाहत जाग्रत होती है तो उसी के अनुरूप अनुभव भी होता है। इसलिए अहम है हमारी चाहत।


स्पर्श निर्भर करता है कि हमारी स्वीकृति कैसी है। स्पर्श को हम कैसे स्वीकार करना चाहते हैं। स्पर्श के कई प्रकार होते हैं। पहला है दृष्टि स्पर्श। जो अनुभव हमें भौतिक स्पर्श से प्राप्त होता है, वही अनुभव हमें दृष्टि अनुभव से भी होता है। दूसरा है स्मृति स्पर्श। जब हम किसी का स्मरण करके किसी का स्पर्श करते हैं। स्पर्श अच्छा भी होता है और बुरा भी। यह इस पर निर्भर करता है कि हमारी भावना कैसी है। जब हम किसी वस्तु का स्पर्श करते हैं, उसके पीछे हमारा उद्देश्य क्या है। इसलिए स्पर्श का सारा मनोविज्ञान इस बात पर निर्भर करता है कि स्पर्श करने वाला किस उद्देश्य से स्पर्श कर रहा है। महत्वपूर्ण है स्पर्श की भावना।