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    महात्‍मा गांधी की शक्ति-उपासना - डॉ. उमराव सिंह चौधरी

    Published: Sun, 29 Jan 2017 10:50 PM (IST) | Updated: Mon, 30 Jan 2017 12:31 AM (IST)
    By: Editorial Team
    mahatma-gandhi 29 01 2017

    आज हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है। गांधीजी हमारे ऐसे गाथा-पुरुष हैं, जिनके विरोध का व्याकरण और असहमति का छंदशास्त्र बड़ा निराला था। दैवीय गुण 'अभय उनके रोम-रोम में रमा हुआ था। वे अद्भुत रणनीतिकार थे। उनकी बातचीत से रचनात्मक तेज और नैतिक सौंदर्य प्रकाशित होता था। उनके संबोधन में उतावलापन नहीं था। उनके प्रस्तुतीकरण या कहन की सरलता और विनम्रता पर दृढ़ता का पानी चढ़ा रहता था। सत्य और अहिंसा की सादी और सूक्ष्म लाठी अपने मस्तिष्क में धारण कर वे आजीवन भेदभाव, दासता और दमन के खिलाफ लड़ते और अड़ते रहे। वे न तो कभी सहमे, न ही कभी भयभीत हुए। संभवत: इसीलिए मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) ने उनके 'सत्याग्रह को 'युद्ध का नैतिक समतुल्य कहा था।


    हमें यह समझना होगा कि गांधी किसी मजबूरी या कमजोरी का नाम नहीं है। उपनिषद की इस उक्ति में उनका अखंड विश्वास था कि 'बलहीन व्यक्ति अपनी आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। वे सच्चे अर्थों में शक्ति के उपासक थे। उनके जीवनीकार रोम्यां रोलां के शब्दों में वे 'बिना क्रॉस के क्राइस्ट और 'एक आदमी की सेना थे। न किसी को मारने और न किसी की मार खाने के वे पक्षधर थे। उनकी भौतिक शक्ति का स्रोत प्रकृति, आत्मा और परमात्मा थे। गांधीजी भी मनुष्य थे। वे संपूर्ण रूप से निर्दोष नहीं रहे होंगे, लेकिन दुर्बलता से उन्होंने कभी दोस्ती नहीं की। उनकी सिंह-गर्जना थी कि 'हिंसा से अधिक दुर्बलता से लड़ने की जरूरत है। तब तक कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं हो सकता, जब तक कि वह शक्तिशाली नहीं हो। चाहे फिर वह अच्छाई हो या बुराई।


    गांधी साहित्य को गंभीरता से खंगालने वाले हर व्यक्ति का, अनेक प्रसंगों में, गांधी की शक्ति और दृढ़ता से साक्षात्कार होता है। 'गांधी वांग्मय, खंड 83, परिशिष्ट 16 में यह छपा है कि 9 अप्रैल 1946 को वायसराय वेवल ने गांधी की मानसिक तत्परता के बारे में एक टिप्पणी की थी। वेवल ने कहा था कि विदा लेते समय मैंने उस बूढ़े, धूर्त गांधी को चेतावनी दी थी कि कांग्रेस आंदोलन की धमकी नहीं दे, क्योंकि भारत में अभी भी हमारे हजारों सिपाही हैं और अगर ब्रिटिश लोगों को या उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचा तो वे घोर मारकाट पर उतारू हो जाएंगे। यह सुनकर गांधी विचलित नहीं हुए, केवल खीझ व नाराजीभरी मुद्रा में मुस्करा दिए। गांधी आश्वस्त थे कि अंग्रेज सैनिकों ने यदि उत्पात मचाया तो भारतीय भाई-बहन उन्हें अच्छा सबक सिखा देंगे।


    'ट्रांसफर ऑफ पॉवर नामक विराट दस्तावेज के खंड-7, पृष्ठ 261-62 से यह स्पष्ट होता है कि महात्मा गांधी यह जानते और मानते थे कि भारत की समस्याएं सुलझने से पहले प्रचंड रक्तपात हो सकता है। उस दशा में कांग्रेस भी मारकाट से दूर नहीं रह सकेगी। इस प्रसंग में गांधी ने कहा था कि 'मैं कांग्रेस से केवल यह आशा करता हूं कि वह उग्र मुसलमानों द्वारा तोड़फोड़ और मारकाट करने पर उनका मुकाबला सीधी लड़ाई से करे। वह आमने-सामने की खरी लड़ाई होगी। यह नहीं कि छिपकर वार किया और भाग निकले। इस पर ब्रिटिश संसदीय दल के एक सदस्य बुडरो राइट की टिप्पणी थी कि 'गांधी कांग्रेस से केवल यह आशा करते हैं कि कांग्रेसी मुस्लिमलीगियों से शानदार ढंग से लड़ें और एक के बदले में एक की जान लें। सौ-सौ जानें नहीं लें, क्योंकि एक के बदले में सौ-सौ जानें लेना तो अंग्रेजों की आदत है।


    गांधीजी ने अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने के लिए 'अहिंसा की शक्ति का भरपूर प्रयोग किया। लेकिन देश की प्रतिरक्षा-तैयारी में अहिंसा की घुसपैठ या घालमेल के पैरोकार वे कभी नहीं रहे। देश की आजादी के तुरंत बाद पाकिस्तान द्वारा 1947 में कश्मीर पर आक्रमण किए जाने पर वहां भारतीय सेना भेजने के निर्णय की उन्होंने सराहना की और उसे स्वीकृति भी प्रदान की। उन्होंने जोर देकर कहा कि हर हाल में कश्मीर को आक्रमणकारियों से मुक्त कराया जाना चाहिए। गांधीजी ने यह कभी नहीं कहा कि देश को आजादी मिलने पर सेना का विघटन कर दिया जाएगा।


    (लेखक देअविवि, इंदौर के पूर्व कुलपति हैं)

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    • Rakesh Gupta15 Oct 2017, 09:57:03 PM

      The blog was wonderful to read and it was really informative. Thanks for sharing.

    • mayuri29 Mar 2017, 10:07:31 AM

      nice blog

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