कावेरी जल विवाद को लेकर इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के चेन्न्ई में होने वाले मैच अन्यत्र स्थानांतरित करने की नौबत आना दुर्भाग्यपूर्ण भी है और चिंताजनक भी। आईपीएल का कावेरी जल विवाद से कोई लेना-देना नहीं और हो भी नहीं सकता। समझना कठिन है कि यदि उग्र विरोध के चलते चेन्न्ई में आईपीएल के मैच नहीं होते तो इससे कावेरी जल विवाद सुलझने में मदद कैसे मिलेगी? आईपीएल का तो केंद्र सरकार से भी कोई लेना-देना नहीं। एक तरह से जल विवाद की खीझ आईपीएल पर निकाली जा रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि राजनीतिक दलों की ओर से उन अनाम-गुमनाम संगठनों को उकसाया जा रहा है जो आईपीएल के विरोध के बहाने अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं। यह अच्छा नहीं हुआ कि राजनीति में कदम रखने जा रहे अभिनेता रजनीकांत ने ऐसा बयान दिया कि कावेरी विवाद के रहते चेन्न्ई में आईपीएल के मैच होना श्ार्मनाक है। हालांकि उन्होंने पिछले आईपीएल मैच के दौरान चेन्न्ई में हुई हिंसा पर नाराजगी जाहिर की, लेकिन ऐसा लगता है कि जो नुकसान होना था, वह हो गया। यह पहली बार नहीं है, जब राजनीतिक क्षुद्रता के कारण्ा चेन्न्ई में होने वाले आईपीएल के मैचों पर संकट मंडराया हो। इसके पहले श्रीलंका के तमिलों से भेदभाव को लेकर आईपीएल के खिलाफ तलवारें तानी गई थीं। बेहतर है कि राजनीतिक दल एवं सामाजिक संगठन इस बुनियादी बात को समझें कि राजनीतिक मसलों को खेल के मैदान में नहीं ले जाया जाना चाहिए। कावेरी जल विवाद के चलते आईपीएल के मैच चेन्न्ई में नहीं हो पाना न तो क्रिकेट के हित में होगा और न ही तमिलनाडु के।


यह सही है कि कावेरी जल का मसला तमिलनाडु के लोगों के लिए एक भावनात्मक मामला है और इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप कदम उठाने में देर नहीं करनी चाहिए, लेकिन यदि यह मान भी लिया जाए कि केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर अमल को लेकर हीलाहवाली दिखाई, तो भी उसका गुस्सा आईपीएल पर निकालने का क्या मतलब? भले ही तमिलनाडु के सियासी दल ऐसा प्रकट कर रहे हों कि कावेरी नदी का जल उनके लिए अपरिहार्य है, लेकिन सच्चाई यह है कि इस नदी के जल पर कर्नाटक समेत अन्य राज्यों का भी अधिकार है। यह वक्त की मांग है कि सभी राज्य सिंचाई के अन्य साधन एवं स्रोत विकसित करें। अच्छा यह होगा कि नदी जल बंटवारे को लेकर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होने वाले राज्य यह समझें कि नदियों पर केवल उनका ही अधिकार नहीं। यह पहली बार नहीं है जब किन्हीं दो राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे को लेकर तनातनी सामने आई हो। कई राज्यों के बीच नदियों के जल के बंटवारे का मसला अदालतों के समक्ष लंबित है। ये मामले यही बताते हैं कि हम 70 सालों बाद भी किस तरह नदियों के जल के बंटवारे का कोई कारगर उपाय नहीं खोज सके हैं। इससे भी बुरा यह है कि रह-रहकर राज्यों के बीच तनातनी वैमनस्यता की हद तक बढ़ जाती है और कभी-कभी तो कानून-व्यवस्था के समक्ष गंभीर खतरे भी उत्पन्न् हो जाते हैं