ऐसी सूचनाओं से देश को शायद ही संतुष्टि मिले कि जम्मू-कश्मीर में लगातार हो रहे आतंकी हमलों को लेकर पाकिस्तान को सबक सिखाने पर गंभीर मंथन शुरू हो गया है। आखिर ऐसा कोई मंथन सुंजवां में सेना के ठिकाने पर हमले के पहले क्यों नहीं किया गया और वह भी तब जबकि ऐसे हमलों के साथ संघर्ष विराम के उल्लंघन का सिलसिला एक अरसे से कायम है? यह पाकिस्तान और उसके पाले-पोसे आतंकियों के दुस्साहस की पराकाष्ठा ही है कि जम्मू के सुंजवां में सेना की कार्रवाई समाप्त होने से पहले ही श्रीनगर में सीआरपीएफ के शिविर को निशाना बनाने की कोशिश की गई। तीन दिन के अंदर सुरक्षा बलों के दो ठिकानों को निशाना बनाया जाना यही बताता है कि जैश और लश्कर सरीखे आतंकी संगठनों के जरिए पाकिस्तान ने अपने छद्म युद्ध को तेज कर दिया है। यह छद्म युद्ध वास्तविक युद्ध से इसलिए कहीं घातक है, क्योंकि इसका कोई नियम नहीं। पाकिस्तान की ओर से जम्मू एवं कश्मीर में थोपे गए इस छद्म युद्ध का प्रतिकार तब तक संभव नहीं, जब तक उसे इसकी बड़ी कीमत न चुकानी पड़े। यह ठीक नहीं कि भारत एक लंबे समय से पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों पर प्रतिक्रिया देने में लगा हुआ है। आतंकी हमलों के बाद सेना एवं सुरक्षा बलों को खुली छूट देना हो या फिर संघर्ष विराम उल्लंघन के बाद की जाने वाली जवाबी कार्रवाई, ये एक तरह की प्रतिक्रियाएं ही कही जाएंगी। पाकिस्तान जब कुछ अनुचित करे, तब उसके खिलाफ कोई कदम उठाने की नीति ने भारत को एक तरह से प्रतिक्रिया देने तक सीमित कर दिया है। न जाने कब से इसकी जरूरत जताई जा रही है कि पाकिस्तान के शैतानी इरादों को भांपकर उसके खिलाफ ऐसी गहन कार्रवाई की जाए, जिससे वह भारत के खिलाफ कुछ करने के पहले न केवल हिचके, बल्कि सौ बार सोचे भी।


आतंकी हमलों के प्रमाण देने या फिर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के साथ मिलकर काम कर रहे हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकी सरगनाओं के खिलाफ कार्रवाई करने की जरूरत जताने से न तो पहले कुछ हासिल हुआ है और न ही आगे होने वाला है। जिस देश ने आतंकवाद को अपनी सुरक्षा और विदेश नीति का अहम हिस्सा बना लिया हो, उससे आतंकवाद के बारे में बात करना कुल मिलाकर समय जाया करना है। यदि पाकिस्तान अपनी भारत विरोधी हरकतों के लिए दंडित नहीं किया जाता तो जम्मू-कश्मीर में खून-खराबा रुकने वाला नहीं है। आखिर क्या कारण है कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए कठोर कूटनीतिक कदम उठाने से भी इनकार किया गया? अब जब पानी सिर के ऊपर बहने लगा है, तब पाकिस्तान को कठोर दंड का भागीदार बनाने के साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि सुरक्षा बलों के ठिकानों पर तमाम हमलों के बाद भी आतंकी पहले जैसे तौर-तरीकों से वहां घुसने में कैसे सफल हो रहे हैं? वे अगर सैन्य ठिकानों में घुसने से पहले ही मार गिराए जा रहे होते तो शायद ऐसे ठिकानों को निशाना बनाने का सिलसिला न जाने कब का थम जाता। स्पष्ट है कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के साथ ही हमारे सुरक्षा तंत्र को भी कुछ सबक सीखने होंगे।