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    संपादकीय : कायम हैं चुनौतियां

    Published: Wed, 06 Dec 2017 11:03 PM (IST) | Updated: Thu, 07 Dec 2017 04:04 AM (IST)
    By: Editorial Team
    urjit patel 06 12 2017

    जिस समझ के आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी ताजा मौद्रिक नीति तय की, उसके दो साफ निष्कर्ष हैं। एक वाक्य में इसे इस रूप में कहा जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में लगातार सुधार की परिस्थितियां मौजूद हैं, लेकिन चुनौतियां भी कायम हैं। चुनौतियों पर काबू नहीं पाया गया, तो उज्ज्वल संभावनाओं को हासिल करना कठिन हो सकता है। इस हकीकत के मद्देनजर रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने नीतिगत ब्याज दरों में फेरबदल नहीं किया। एमपीसी ने ध्यान दिलाया कि पूंजी बाजार से बड़ी मात्रा में धन उठाया गया है, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस सूचकांक में सुधार हुआ है, ऋण न चुका रहे बड़े कर्जदारों को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया शुरू हुई है और सरकार ने 2.11 लाख करोड़ रुपए बैंकों को फिर से वित्त मुहैया कराने के लिए मंजूर किए हैं। ये सभी अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक बातें हैं। इसके अलावा एमपीसी ने रेखांकित किया कि निकट अतीत में ब्याज दरों में हुई कटौती के पूरे लाभ बैंकों ने पुराने कर्जदारों को नहीं दिए हैं। वे ऐसा करें, तो बैंकों के कर्ज डूबने की समस्या को दूर करने में और मदद मिलेगी। उससे निवेश के लिए अनुकूल स्थितियां बनेंगी। अभी असली चुनौती, खासकर निजी निवेश को बढ़ाना है। ऐसा हो तो रोजगार बढ़ेंगे। उससे बाजार में ज्यादा पैसा आएगा, मांग बढ़ेगी। इस तरह अर्थव्यवस्था का गति चक्र चल निकलेगा।


    मगर इस बीच एक नया मसला खड़ा होता दिखता है। मुद्रास्फीति एक बार फिर बढ़ने लगी है। अक्टूबर के बाद उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति दर 3.58 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो सात महीने की सबसे ऊंची वृद्धि दर है। इसके मद्देनजर रिजर्व बैंक का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष की आखिरी छमाही में मुद्रास्फीति दर 4.3-4.7 प्रतिशत तक रह सकती है। जबकि रिजर्व बैंक ने मध्यम अवधि में मुद्रास्फीति दर को 4 फीसदी तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया हुआ है। दरअसल, 2017-18 में इसे 3.5 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य था। मगर खाद्य पदार्थों और पेट्रोलियम के दाम में इजाफे को देखते हुए यह लक्ष्य पाना फिलहाल मुश्किल लगता है। इसके अलावा राजकोष भी दबाव में है, जिसका सीधा असर मुद्रास्फीति दर पर पड़ता है। इस वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे का जितना अनुमान लगाया गया था, उसके 96.1 फीसदी तक वह अक्टूबर के अंत तक ही पहुंच चुका था। राजस्व उगाही में कमी और और बढ़ता खर्च इसके प्रमुख कारण हैं। किसानों की कर्ज माफी, पेट्रोलियम पर उत्पाद शुल्क में आंशिक कटौती और अनेक वस्तुओं पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में कटौती का असर राजकोषीय सेहत पर पड़ा है। स्पष्टत: इन सबका मिला-जुला असर अर्थव्यवस्था में सुधार की संभावनाओं पर दिख रहा है। इन्हें देखते हुए ब्याज दरों में कटौती न कर रिजर्व बैंक ने सरकार को आगाह किया है। संदेश यही है कि राजकोषीय घाटे तथा मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने के कदम उसे अविलंब उठाने चाहिए, ताकि अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद अच्छे दिन की संभावनाओं को यथार्थ में बदला जा सके।

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