यह गंभीर चिंता की बात है कि बैंकों के एनपीए यानी फंसे कर्ज की समस्या का कोई ठोस समाधान होता हुआ नहीं दिख रहा है। हालांकि केंद्र सरकार की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि वह पिछली सरकार की ओर से पैदा की गई इस समस्या से सही तरह निपट रही है, लेकिन अभी यह कहना कठिन है कि उसे अपेक्षित सफलता मिल पा रही है। यह निराशाजनक है कि दीवालियेपन संबंधी जिस नए कानून-आईबीसी से बैंकों के फंसे अथवा डूबे कर्ज की ठीक-ठाक वसूली होने की उम्मीद की जा रही थी वह पूरी होती नहीं दिख रही है। कुछ ऐसी ही स्थिति दूसरे अन्य उपायों की भी है। अगर बैंकों के अधिकारी यह मानने लगे हैं कि कुल फंसे कर्ज में से एक चौथाई से अधिक की वसूली शायद ही हो सके तो इसका मतलब है कि सरकार और साथ ही रिजर्व बैंक को नए सिरे से कुछ करना होगा। इस मामले में जल्द ठोस कदम उठाए जाने इसलिए आवश्यक हैं, क्योंकि बैंक अपनी खराब वित्तीय स्थिति के लिए अधिक चर्चा में रहने लगे हैं। जब दुनिया भारत को तेज गति से तरक्की करने वाले देश के रूप में देख रही है और सरकार भारतीय बाजार को निवेश के आदर्श ठिकाने के तौर पर पेश करने में लगी हुई है तब यह बिल्कुल भी ठीक नहीं कि हमारे बैंक अपनी खस्ताहाल आर्थिक स्थिति के लिए चर्चा में बने रहें। न केवल विदेशी निवेशकों का भरोसा जीतने, बल्कि देश की आम जनता को आशवस्त करने के लिए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि बैंक फंसे कर्ज के कारण लडख़ड़ाते हुए न दिखें। अभी तो ऐसा लगता है कि सरकार और रिजर्व बैंक एनपीए की समस्या से पार करने के लिए जो भी कर रहे हैं, बैंक उस पर पानी फेर दे रहे हैं।


यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि हमारे बैंक उन तौर-तरीकों का सख्ती से पालन नहीं कर रहे हैं जिनसे एनपीए बढऩे न पाए। वे किस तरह अपनी कार्यप्रणाली में अपेक्षित तब्दीली नहीं ला रहे, इसका एक नया प्रमाण देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक पंजाब नेशनल बैंक में करीब 11 हजार करोड़ रुपये का घोटाला सामने आना है। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि इस घोटाले का पर्दाफाश हो गया, क्योंकि इस सवाल का जवाब शायद ही किसी के पास हो कि क्या घोटाले में डूबी रकम को हासिल किया जा सकेगा? यह भी एक तरह के खतरे का ही संकेत है कि अभी चंद दिन पहले देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ने 17 साल बाद 2416 करोड़ रुपये का घाटा होने की सूचना दी। ध्यान रहे कि यह घाटा एक तिमाही का है। जिस तरह बैंक घाटे से बाहर आते नहीं दिख रहे उसे देखते हुए यह सवाल उठेगा ही कि आखिर सरकार कब तक उन्हें उबारने के लिए जनता के पैसे उनके खातों में डालती रहेगी? सबसे अजीब यह है कि बैंक मुसीबत में फंसे होने के बाद भी आंकड़ेबाजी के जरिये गुलाबी तस्वीर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे तो यही लगता है कि वे खुद में सुधार लाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं।