यह ठीक नहीं कि कई राज्य राशन प्रणाली में सुधार को लेकर अपेक्षित उत्साह नहीं दिखा रहे हैं। इसका कोई औचित्य नहीं कि भाजपा या उसके सहयोगी दलों के शासन वाले राज्य भी सुस्ती का परिचय दें, लेकिन तथ्य यही है कि राशन की दुकानों को प्वाइंट ऑफ सेल यानी पॉस मशीनों से लैस करने में जो राज्य पीछे हैं, उनमें उत्तर प्रदेश, बिहार और असम की भी गिनती की जा रही है। यह स्थिति तब है जब केंद्र सरकार लगातार इस पर जोर दे रही है कि सभी राज्य पात्र लोगों को ही राशन देना सुनिश्चित करने के लिए राशन की दुकानों में पॉस मशीनें लगाएं।


राज्य सरकारें इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकतीं कि राशन प्रणाली अभी भी खामियों से मुक्त नहीं हो सकी है। राशन प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार का पता इससे चलता है कि जब राश्ान कार्डों की छानबीन का अभियान चला, तो करीब दो करोड़ राशन कार्ड फर्जी पाए गए। जाहिर है कि दो करोड़ लोगों के हिस्से का राशन अपात्र यानी भ्रष्ट तत्वों के पास जा रहा था।


आखिर जब पॉस मशीनें इस बंदरबांट पर लगाम लगाने में समर्थ हैं, तो फिर इसका क्या मतलब कि राशन दुकानों को इन मशीनों से लैस करने में आनाकानी का परिचय दिया जाए? यह आनाकानी भ्रष्टाचार के साथ-साथ एक तरह से संसाधनों के दुरुपयोग की भी अनदेखी है। इसके अतिरिक्त यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के प्रति खोखली प्रतिबद्धता का भी सूचक है।


यह गनीमत है कि उत्तर प्रदेश में तो राशन की दुकानों को पॉस मशीनों से लैस करने का काम धीमी गति से ही सही, कुछ आगे बढ़ रहा है, लेकिन बिहार जहां का तहां नजर आ रहा है। कुछ ऐसी ही स्थिति पश्चिम बंगाल सरकार की भी है। हैरत नहीं कि ममता सरकार इस जरूरी काम की अनदेखी केंद्र सरकार के प्रति अपना विरोध जताने के लिए कर रही हो।


जो भी हो, राज्यों के लिए उचित यही है कि वे जन-कल्याण की योजनाओं को सही तरह से लागू करने के प्रयासों को दलगत राजनीति से परे रखें। एक अनुमान के अनुसार फर्जी राशन कार्ड रद्द किए जाने से ही करीब दस हजार करोड़ रुपए की बचत हुई है। यह इसलिए संभव हो सका, क्योंकि पॉस मशीनों को उपभोक्ताओं के आधार नंबर से जोड़ने से पात्र लोगों की पहचान पुख्ता हो जाती है। यह प्रयोग इसी बात को रेखांकित करता है कि जन-कल्याण की योजनाओं को तकनीक के जरिए संचालित करके एक ओर जहां भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकती है, वहीं वास्तविक जरूरतमंदों की सही तरह से मदद की जा सकती है।


मुश्किल यह है कि जब भी सरकारी योजनाओं को तकनीक से लैस करने की बात होती है तो संकीर्ण राजनीतिक कारणों से उसका विरोध शुरू हो जाता है। इसी प्रवृत्ति के चलते आधार कार्ड का मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है। बेहतर है कि राज्य सरकारें राशन प्रणाली में सुधार लाने के मामले में अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दें, क्योंकि इस प्रणाली में काफी कुछ सुधार के बाद भी उसे दुरुस्त करना शेष है और इसी वजह से उसके मूल्यांकन की एक योजना शुरू करनी पड़ रही है।