विपक्षी एकता के मकसद से सोनिया गांधी की ओर से आयोजित बैठक यही बता रही है कि भाजपा के खिलाफ कोई मजबूत मोर्चा बनाने की होड़ तेज हो रही है। इसके पहले तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेता चंद्रशेखर राव विपक्षी एकता की पहल कर चुके हैं और उनके पहले शरद पवार एवं शरद यादव भी। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के साथ-साथ माकपा नेता सीताराम येचुरी भी विपक्षी दलों में एका के लिए सक्रिय हो चुके हैं।


आने वाले दिनों में ऐसी सक्रियता देखने को मिलती ही रहेगी, क्योंकि लोकसभा चुनाव करीब आते जा रहे हैं और यह किसी से छिपा नहीं कि किस तरह प्रत्येक आम चुनाव के पहले तीसरे-चौथे मोर्चे के गठन की कवायद होती रही है। नि:संदेह यह नहीं कहा जा सकता कि पहले की तरह आगे भी विपक्षी एकता की कोशिश नाकाम रहेगी, लेकिन यह सवाल तो उठेगा ही कि आखिर विपक्षी दल एकजुट होकर क्या हासिल करना चाह रहे हैं?

अगर वे यह सोच रहे हैं कि उनके एक साथ आ जाने से जनता उनके पीछे आ खड़ी होगी तो ऐसा शायद ही हो। इसके आसार इसलिए कम हैं, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी को रोकने के नाम पर एक छतरी के नीचे आने की जरूरत जता रहे राजनीतिक दल अब तक यह नहीं बता पा रहे हैं कि उनके पास देश की जनता को देने के लिए क्या है? जो विपक्षी नेता यह कह रहे हैं कि मोदी सरकार के चलते देश रसातल में जा रहा है, उन्हें यह समझ में आना चाहिए कि जनता उनसे यह जानना चाह रही है कि आखिर वे अपने किन तौर-तरीकों से देश का उत्थान करेंगे?


वैकल्पिक नीतियों और कार्यक्रमों का उल्लेख करना तो दूर रहा, विपक्षी नेता कोई ठोस वैकल्पिक विचार तक पेश नहीं कर पा रहे हैं। इसके नाम पर कभी इस पर जोर दिया जाता है कि सब किसानों का कर्ज माफ होना चाहिए और कभी इस पर कि गरीबों को इस या उस मद में सबसिडी अथवा रियायत मिलनी चाहिए। चंद दिन पहले ही जब महाराष्ट्र के किसान सड़कों पर उतरे तो विपक्षी दलों ने कर्ज माफी की उनकी मांग के पक्ष में खड़े होने में एक क्षण की भी देरी नहीं की, जबकि एक अरसे से बार-बार यह साबित हो रहा है कि कृषि कर्ज माफी एक बेहद खराब नीति और बुरा विचार है।


विपक्षी दल गांव, गरीब, किसान, मजदूर के हित के नाम पर निर्धनता का जैसा महिमामंडन कर रहे हैं, उससे तो यह लगता ही नहीं कि वे किसी दूरगामी सोच से लैस हैं। ठोस वैकल्पिक नीति और विचार से हीन विपक्षी दल अपनी एका की जरूरत तो जता सकते हैं, लेकिन वे जनता का ध्यान आकर्षित नहीं कर सकते।


इस वक्त विपक्षी दलों की समस्या केवल यही नहीं है कि वे देश की जनता के समक्ष कोई वैकल्पिक नजरिया पेश नहीं कर पा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि उनके बीच प्रधानमंत्री पद के दावेदार बढ़ते जा रहे हैं। विडंबना यह है कि इनमें ज्यादातर नेता वे हैं, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मसलों पर बेहद संकीर्ण सोच रखते हैं। आखिर राष्ट्रीय महत्व के मामलों पर क्षेत्रीय मसलों को तरजीह देने वाले देश का नेतृत्व करने का भरोसा कैसे दिला सकते हैं?