केंद्र सरकार ने साहसी कदम उठाया है। जिस समय भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ हलकों में चिंताएं जताई जा रही थीं, तब उसके ताजा फैसलों को मास्टरस्ट्रोक कहा जा सकता है। इससे दुनियाभर के निवेशकों में सकारात्मक संदेश जाएगा। गौरतलब है कि ये कदम उस समय उठाया गया है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्विट्जरलैंड के शहर दावोस में होने वाली वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सालाना बैठक में जाने की तैयारी में हैं। मोदी वहां 23 जनवरी को दुनिया की मशहूर कंपनियों के प्रमुखों को संबोधित करेंगे। साफ है, उसके पहले भारत में बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश का मार्ग प्रशस्त किया गया है। इसके तहत अब सिंगल ब्रांड रिटेल में भी विदेशी कंपनियां ऑटोमेटिक रूट से शत-प्रतिशत निवेश कर सकेंगी। यानी ऐसे निवेश के लिए उन्हें पूर्व-अनुमति की जरूरत नहीं होगी। साथ ही ऐसी निवेशक कंपनियों के लिए भारत के घरेलू बाजार से 30 फीसदी खरीदारी करने की शर्त को आसान बनाया गया है। शर्तों में फेरबदल के बाद उम्मीद है कि ज्यादा-से-ज्यादा विदेशी कंपनियां भारत में कारोबार के लिए प्रोत्साहित होंगी। सिंगल ब्रांड के कारोबार में एच एंड एम, गैप और आइकिया जैसी कंपनियां पहले ही भारतीय बाजार में आ चुकी हैं। खबरों के मुताबिक 50 से भी ज्यादा कंपनियां इस क्षेत्र में आने को तैयार हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने की नरेंद्र मोदी सरकार की नीति काफी सफल रही है। 2013-14 में 36.05 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया था, जो 2016-17 में 60.08 अरब डॉलर तक पहुंच गया। अब चूंकि एनडीए सरकार ने फिर निवेशकों के अनुकूल निर्णय लिया है, तो ऐसे निवेश में और बढ़ोतरी हो सकती है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। विदेशी कंपनियां अपने साथ नई तकनीक और कार्यशैली भी लेकर आती हैं। इसका लाभ आम उपभोक्ता को मिलता है।


देश के व्यापारी समुदाय में सरकार के ऐसे निर्णयों से कुछ चिंता पैदा होना स्वाभाविक है। सरकार को इसे दूर करने के लिए उनके संगठनों से संवाद कायम करना चाहिए। वैसे अतीत का अनुभव यही है कि विदेशी निवेश को लेकर जताई गई अधिकांश चिंताएं निराधार साबित होती हैं। अब सरकार ने कंस्ट्रक्शन डेवलपमेंट क्षेत्र में भी ऑटोमेटिक रूट से 100 फीसदी विदेशी निवेश की छूट दे दी है। इसके अलावा एक बड़ा फैसला एयर इंडिया में विदेशी कंपनियों को 49 प्रतिशत तक निवेश की हरी झंडी देना है, हालांकि इसके लिए सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी होगी। एयर इंडिया में विनिवेश का फैसला सरकार पहले ही ले चुकी थी। कई बेलआउट पैकेज के बावजूद अपने पैरों पर खड़ा रहने में विफल रही इस एयरलाइन में निजी क्षेत्र को हिस्सेदारी मिले, इस पर अब लगभग आम-सहमति बन चुकी है। अब चूंकि विदेशी कंपनियां भी हिस्सेदारी हासिल कर सकेंगी, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि एयर इंडिया के प्रबंधन को अधिक पेशेवर बनाना संभव हो सकेगा। कुल मिलाकर यह कहने का आधार बनता है कि अर्थव्यवस्था को गति देना और देश को समृद्ध बनाना मोदी सरकार की शीर्ष प्राथमिकता बनी हुई है। उस दिशा में अब उसने कुछ और साहसी फैसले लिए हैं।