राजस्थान के अलवर जिले में सामूहिक दुष्कर्म की घटना को लेकर हो रही राजनीति बिल्कुल भी ठीक नहीं। यह शर्मनाक वारदात राजनीतिक या चुनावी लाभ लेने का नहीं, बल्कि ऐसा माहौल बनाने का विषय है, ताकि भविष्य में सभ्य समाज को विचलित करने वाली ऐसी घटनाओं पर लगाम लगे। इससे बुरी बात और कोई नहीं कि स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने इस घटना को इसलिए दबाने की कोशिश की, ताकि उसका चुनाव पर कोई असर न पड़े। क्षोभ की बात केवल यही नहीं कि एफआईआर दर्ज करने में देर की गई, बल्कि यह भी है कि अपराधियों की गिरफ्तारी में भी हीलाहवाली की गई। इस पर संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि लापरवाही और संवेदनहीनता का परिचय देने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई, क्योंकि यही अधिक जान पड़ता है कि आक्रोश को शांत करने के इरादे से यह कार्रवाई की गई। इस मामले में तो ऐसी कार्रवाई की जरूरत थी, जिससे कोई मिसाल कायम होती। यह पुलिस के टालमटोल वाले रवैये का ही दुष्परिणाम रहा कि एक दलित महिला का उसके पति के सामने दुष्कर्म करने वालों ने अपने वहशी कृत्य का वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिया। पुलिस इसे रोक सकती थी, किंतु वह चुनाव की चिंता करती रही। इतना ही नहीं, घटना का वीडियो वायरल होने पर उसने यह कहकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली कि एक और धारा जोड़ देंगे। यह नाकारापन की हद है कि घटना के करीब एक हफ्ते बाद तीन आरोपितों की गिरफ्तारी हो सकी।

अलवर कांड का खौफनाक सच सामने आने के बाद राजनीतिक दलों से लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सक्रियता समझ में आती है, लेकिन इस घटना पर सस्ती राजनीति शुरू हो जाना समझ से परे है। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि इस तरह की राजनीति इसीलिए हो रही है, क्योंकि देश में आम चुनाव हैं और दलितों के प्रति होने वाली घटनाओं को राजनीतिक मसला बनाने का चलन बन गया है। इस घटना की निंदा करने और इसे लेकर विरोधी राजनीतिक दलों पर निशाना साधने में अंतर है। इससे से बचा जाना चाहिए था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से खुद प्रधानमंत्री भी इस मामले का जिक्र करके विरोधी दलों पर निशाना साधने में लगे हुए हैं। उन्होंने मायावती को चुनौती दी कि वह राजस्थान सरकार से समर्थन वापस लेकर दिखाएं। इसके जवाब में बसपा प्रमुख ने प्रधानमंत्री को गुजरात की दलित विरोधी घटनाओं की याद दिलाई। यह सब न होता तो बेहतर होता। मुश्किल यह है कि राजनीतिक दल जघन्य घटनाओं का राजनीतिक लाभ उठाने की हरसंभव कोशिश करते हैं। यह भी देखने को मिल रहा है कि अगर पीड़ित दलित समाज से होता है तो एक अलग तरह की राजनीति चालू हो जाती है। यह राजनीति भी अपनी-अपनी सुविधा से होती है। घटना विरोधी दल शासित राज्य में हो तो बाकी राजनीतिक दलों में खुद को दलित हितैषी दिखाने की होड़ लग जाती है। स्त्री के सम्मान को किसी जाति-समुदाय से जोड़कर न देखा जाए तो बेहतर। कोशिश तो यह होनी चाहिए कि दुष्कर्म के आरोपितों को जल्द से जल्द कठोर सजा मिले। यह खेदजनक है कि ऐसा नहीं हो रहा है।