आयकर विभाग के एक दर्जन अधिकारियों की छुट्टी करने के बाद जिस तरह केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क विभाग के 15 अफसरों को जबरन रिटायर किया गया, उससे यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार ने भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ निगाहें टेढ़ी कर ली हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अधिकारियों के खिलाफ सख्ती बरतने का सिलसिला आगे भी कायम रहना चाहिए, क्योंकि टैक्स से संबंधित विभागों के अलावा केंद्र सरकार के अन्य विभागों में भी ऐसे अधिकारी हैं, जो भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे हैं। आखिर यह एक तथ्य है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग करीब 120 अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए विभिन्न विभागों की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। इनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा के भी अधिकारी हैं और बैंकों के अफसर भी। यह ठीक नहीं कि भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों से घिरे अधिकारियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई धीमी गति से हो। यह काम तो त्वरित किया जाना चाहिए। इससे ही भ्रष्ट अधिकारियों के बीच सही संदेश्ा जाएगा और वे अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने से बाज आएंगे। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि जिन अधिकारियों को जबरन रिटायर किया गया, उनमें से कई ऐसे हैं जिन पर रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप थे। इनमें कुछ निलंबित भी चल रहे थे। इसका मतलब है कि उनके खिलाफ जारी कानूनी कार्रवाई धीमी गति से ही आगे बढ़ रही थी। यह ठीक है कि जिन अधिकारियों को जबरन रिटायर किया गया, उनके खिलाफ दर्ज मामले अदालतों में चल रहे हैं, लेकिन कोशिश यह होनी चाहिए कि उन्हें अपने किए की सजा जल्द मिले।

भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे अधिकारियों को जिस नियम के तहत हटाया गया, वह यह कहता है कि सरकार एक समयसीमा के बाद ही भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है। स्पष्ट है कि उन अफसरों के खिलाफ भी कार्रवाई के उपाय खोजने होंगे, जो सेवा में आने के कुछ समय बाद ही रिश्वतखोरी अथवा अन्य अनुचित कार्यों में लिप्त हो जाते हैं। यह जरूरी है कि उन अधिकारियों के खिलाफ भी सख्ती की जाए, जो अपनी संपत्ति का विवरण समय पर नहीं देते या फिर आनाकानी करते हैं। इस सबके अलावा सरकार को इस पर भी ध्यान देना होगा कि आखिर टैक्स से संबंधित विभागों के अधिकारी इतनी आसानी से मनमानी कैसे कर ले रहे हैं? बेहतर होगा कि उनके विवेकाधिकारों को परिभाषित करने के बारे में सोचा जाए। ऐसी भी कोई व्यवस्था करनी होगी, जिससे जहां भ्रष्ट अधिकारी किसी तरह का संरक्षण हासिल न कर सकें, वहीं ईमानदार अधिकारियों को प्रोत्साहन मिले। इसके लिए आवश्यक हो तो नियम-कानूनों में परिवर्तन किया जाना चाहिए। इसी के साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि नौकरशाही में समग्र सुधार कैसे किया जा सकता है, क्योंकि भ्रष्ट अधिकारी तो राज्यों की सेवाओं में भी हैं और यह एक तथ्य है कि केंद्रीय स्तर पर भले ही लोकपाल व्यवस्था बन गई हो, लेकिन राज्यों के स्तर पर सक्षम लोकायुक्त व्यवस्था का निर्माण अभी भी नहीं हो सका है। ऐसे में बेहतर यही होगा कि नौकरशाही में व्यापक सुधार के कदम जल्द से जल्द उठाए जाएं।