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    संपादकीय : मकसद पर सवाल

    Published: Thu, 07 Dec 2017 11:10 PM (IST) | Updated: Fri, 08 Dec 2017 04:00 AM (IST)
    By: Editorial Team
    rahulgandhi 07 12 2017

    फलस्तीन-इसराइल के विवाद में बेशक सबसे संवेदनशील मुद्दा यरुशलम का रहा है। इस शहर को यहूदी, ईसाई और मुस्लिम, तीनों धर्मावलंबी पवित्र स्थली समझते हैं। यही वजह है कि इसराइल और फलस्तीन, दोनों इसे अपनी राजधानी के रूप में देखते रहे हैं। वर्ष 1948 में अपनी स्थापना के साथ ही इसराइल ने अपनी सरकार का मुख्यालय इसी शहर में बनाया। लेकिन नीदरलैंड्स और कोस्टारिका के अलावा किसी और देश ने यहां अपना दूतावास नहीं बनाया। 1980 आते-आते उन दोनों देशों ने भी अपने दूतावास वहां से हटा लिए।


    तब से लगभग सभी देशों ने तेल अवीव को ही इसराइल की राजधानी के रूप में मान्यता दे रखी थी। लेकिन बुधवार रात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने देश का रुख बदल दिया। उन्होंने यरुशलम को इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता देने का एलान किया। उसके बाद उनके प्रशासन के अधिकारियों ने बताया कि अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से यरुशलम ले जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।


    इस निर्णय से पश्चिम एशिया और अरब जगत में आक्रोश की लहर दौड़ गई है। फ्रांस जैसे यूरोपीय देश भी इससे खफा हैं। इसीलिए ये सवाल उठा है कि आखिर ट्रंप क्या हासिल करना चाहते हैं? खुद अनेक अमेरिकी विश्लेषकों का यह मानना है कि इस एलान के बाद इसराइल-फलस्तीन विवाद में अमेरिका की निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका खत्म हो गई है। 1993 के ओस्लो समझौते में इसराइल ने भी माना था कि यरुशलम की स्थिति का निर्णय बातचीत से होगा। इस शहर के पूर्वी हिस्से पर उसने 1967 के छह दिवसीय युद्ध के दौरान कब्जा जमाया था। तब तक वह इलाका जॉर्डन के नियंत्रण में था। अरब देश उसे अवैध कब्जा मानते हैं।


    ट्रंप के ताजा फैसले का एक अर्थ यह भी माना जा सकता है कि अमेरिका ने उस कब्जे को वैध मान लिया है। साथ ही इस शहर को इसराइल के अभिन्न् अंग के रूप में मान्यता दे दी है। इस तरह वह इस विवाद में एक पक्ष के साथ खड़ा हो गया है। यह इस सत्तर साल पुराने विवाद में अमेरिकी रुख में बुनियादी बदलाव है। इसके बाद फलस्तीन या उसके समर्थक मुस्लिम देशों के लिए शांति प्रक्रिया में अमेरिका की मध्यस्थता को स्वीकार करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।


    यह जगजाहिर है कि ट्रंप के रुख से कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मामलों में अमेरिका का रुतबा क्षीण हो रहा है। उधर, ये धारणा मजबूत हो रही है कि उनकी तमाम चिंताएं अमेरिका में अपने समर्थक आधार को गोलबंद किए रखने तक सीमित हैं। यरुशलम संबंधी इस फैसले से उनके देश में कट्टरपंथी ईसाई समुदाय और इसराइल समर्थक लॉबी खुश होगी। इन समूहों को लुभाने के लिए पहले भी ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के नेता इसराइल के पक्ष में उग्र बयान देते रहे हैं। मगर सत्ता में आने पर किसी ने उस हद तक जाने की जुर्रत नहीं की, जहां ट्रंप चले गए हैं।


    स्पष्टत: इससे पश्चिम एशिया में अमेरिका के हित नहीं सधेंगे और विश्व में एक अनावश्यक विवाद खड़ा होगा। मगर ट्रंप का इतिहास बताता है कि वे ऐसी बातों की फिक्र नहीं करते।


    और जानें :  # Donald Trump # Jerusalem # Israel
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