सार्वजनिक जीवन में सक्रिय कुछ लोग किस तरह राजनीतिक आक्रामकता और अभद्रता में अंतर करना भूल जाते हैं, यह तब पुन: प्रकट हुआ जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने की धुन में भाषा की मर्यादा का उल्लंघन कर गए। चूंकि आम चुनाव करीब आते जा रहे हैं, इसलिए राजनीतिक दलों के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला कायम होना समझ आता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि एक-दूसरे के प्रति असम्मान व्यक्त किया जाए और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया जाए। यह स्पष्ट है कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री से तमाम शिकायतें हैं और वह उन्हें सत्ता से हटाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह समझ आए तो बेहतर कि यह काम भाषा की मर्यादा लांघने से आसान नहीं होने वाला। आखिर वह प्रधानमंत्री के लिए डरपोक, डरता है, भाग जाएगा... जैसी भाषा का इस्तेमाल करके देश के लोगों को क्या संदेश देना चाहते हैं? उन्होंने केवल ऐसी शब्दावली का ही प्रयोग नहीं किया, बल्कि यह भी दिखाया कि प्रधानमंत्री किसी की चुनौती मिलने पर किस तरह मैदान छोड़कर चलते बनते हैं। इस पर मंच पर बैठे नेताओं ने तालियां बजाकर उनका उत्साह बढ़ाया। इससे यही पता चला कि राजनीतिक विमर्श का स्तर किस तरह गिरता चला जा रहा है। नि:संदेह राजनीतिक विमर्श में गंभीर गिरावट के लिए केवल राहुल गांधी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन क्या इससे इनकार किया जा सकता है कि वह सियासी माहौल में कटुता घोलने का काम करने में लगे हुए हैं? इसके पहले वह प्रधानमंत्री को चोर भी बता चुके हैं। क्या ऐसी भाषा उन्हें शोभा देती है?

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहस के लिए जिस तरह चुनौती दी, वैसी ही चुनौती अन्य नेता भी दूसरे नेताओं को समय-समय पर देते रहते हैं, लेकिन उनकी दिलचस्पी इसमें कभी नहीं होती कि ऐसा हो। कोई नहीं जानता कि अपने देश में प्रमुख राजनीतिज्ञ सार्वजनिक तौर पर वैसी बहस करने के लिए तैयार क्यों नहीं, जैसी कुछ अन्य देशों और खासकर अमेरिका में होती है? अपने यहां बहस के नाम पर आरोप-प्रत्यारोप ही अधिक उछलते हैं। इस दौरान छल-छद्म का सहारा तो लिया ही जाता है, आधे-अधूरे तथ्यों और कई बार तो झूठ के सहारे जनता को गुमराह करने की कोशिश की जाती है। आखिर यह एक तथ्य है कि राफेल सौदे को विवादास्पद बताने के लिए झूठे और गढ़े हुए तथ्यों का सहारा लिया गया। जब बड़े नेता ऐसा करते हैं तो छोटे नेता एवं कार्यकर्ता और अधिक बेलगाम हो जाते हैं। वे सोशल मीडिया पर भद्दी और ओछी टिप्पणियां करने में एक-दूसरे से होड़ करते दिखते हैं। दुर्भाग्य से कुछ ऐसी ही होड़ अब टीवी चैनलों में भी दिखने लगी है। कुल मिलाकर संसद से लेकर सड़क तक राजनीतिक विमर्श के स्तर में गिरावट का सिलसिला कायम है। मुश्किल यह है कि लोकतंत्र की दुहाई देने और राजनीतिक शुचिता की बातें करने वाले नेता इसके लिए कुछ भी नहीं कर रहे कि राजनीतिक विमर्श मर्यादित तरीके से हो। अगर राजनीतिक विमर्श के स्तर को ठीक करने की परवाह नहीं की जाएगी तो भारतीय राजनीति और अधिक बदनाम ही होगी।