अच्छा होता कि कश्मीर में तैनात मेजर आदित्य कुमार के पिता को सुप्रीम कोर्ट में इस आशय की याचिका दायर नहीं करनी पड़ती कि उनके सैन्य अफसर बेटे और उसकी टीम के खिलाफ शोपियां में दर्ज की गई एफआईआर रद्द की जाए। इसे तो रक्षा मंत्रालय को सुनिश्चित करना चाहिए था कि जम्मू-कश्मीर में बेहद विषम परिस्थितियों में अपना कर्तव्य पालन कर रहे सैन्य अधिकारी के खिलाफ दर्ज की गई गैरजरूरी रपट खारिज हो। समझना कठिन है कि रक्षा मंत्रालय अथवा अन्य किसी केंद्रीय मंत्रालय की ओर से ऐसी कोई पहल क्यों नहीं की गई? नि:संदेह सवाल यह भी है कि जम्मू-कश्मीर सरकार को इस नतीजे पर पहुंचने में क्या कठिनाई हो रही है कि इस तरह किसी सैन्य अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का कोई औचित्य नहीं बनता? क्या यह अजीब नहीं कि एक ओर खुद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती यह कहती हैं कि कश्मीर में अभी ऐसे हालात नहीं कि अफस्पा को हटाया जा सके और दूसरी ओर उनकी पुलिस सेना के अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करना जरूरी समझ रही है? क्या उन्हें पता नहीं कि कश्मीर में सेना अपनी मर्जी से नहीं है? वह तो घाटी के खराब हालात की वजह से वहां है। इन खराब हालात के लिए जो तत्व जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई के बजाय उनकी अतिवादी हरकतों से जूझ रहे सेना के अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करना एक तरह से आतंकवाद और अलगाववाद के समर्थकों का खुला एवं नग्न तुष्टीकरण करना ही है। तुष्टीकरण की इसी नीति के चलते ही कश्मीर में आतंकियों के समर्थक पत्थरबाजों का दुस्साहस खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है।


हाल में करीब एक हजार पत्थरबाजों पर से मुकदमे इस आधार पर वापस ले लिए गए कि उन्होंने पहली बार यह गुनाह किया था और उन्हें माफी देने से अच्छा संदेश जाएगा। किसी को बताना चाहिए कि उन्मादी पत्थरबाजों से जूझ रहे सैन्यकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से देश को क्या संदेश जाएगा? शोपियां में पत्थरबाजों की हिंसक भीड़ से जान बचाने के लिए गोलियां चलाने को विवश हुए सेना के अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से केवल यही संकेत नहीं मिलता कि बेलगाम उन्मादी तत्वों के हितों की जरूरत से ज्यादा चिंता की जा रही है, बल्कि यह भी रेखांकित होता है कि सैन्यकर्मियों के मानवाधिकारों के बारे में सोचने से बचा जा रहा है। यह एक तरह की आत्मघाती राजनीति है और शायद इसीलिए यह सवाल उठ रहा है कि क्या पत्थरबाजों के मानवाधिकारों के आगे सेना के मानवाधिकार गौण हैं? इस मुगालते से बाहर आने में ही भलाई है कि आतंकियों के हमदर्द पत्थरबाजों के प्रति नरमी बरतने से उनका दिल जीता जा सकता है। कश्मीर में पत्थरबाजी ने एक उद्योग का रूप ले लिया है। यह दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब आतंक समर्थक इस उद्योग को ध्वस्त करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए, तब उसे बल प्रदान करने और साथ ही सेना के मनोबल को प्रभावित करने वाले काम किए जा रहे हैं। ये वे तौर-तरीके हर्गिज नहीं, जिनके जरिए कश्मीर में आतंकवाद के शातिर समर्थकों को हतोत्साहित किया जा सके।