संसद के बजट सत्र के कार्यक्रम की घोषणा इस अच्छी खबर के साथ हुई कि इस अधिवेशन की अवधि में कटौती नहीं होगी। पहले खबर थी कि चार राज्यों एवं एक केंद्रशासित प्रदेश में अप्रैल-मई में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एनडीए सरकार इस सत्र को छोटा रखना चाहती है। सुझाव आया था कि आम चलन के मुताबिक दो चरणों में चलाने के बजाय बजट सत्र को एक ही दौर में पूरा कर लिया जाए। मगर सत्र का कार्यक्रम तय करने के लिए सरकार और विपक्ष के मध्य हुई बैठक में सहमति बनी कि सत्र को पूरा समय मिलना चाहिए।

तो अब बजट सत्र का पहला चरण 23 फरवरी से 16 मार्च तक चलेगा। दूसरा दौर 25 अप्रैल से 13 मई तक होगा। पहले चरण में 25 फरवरी को रेल बजट, 26 तारीख को सरकार बजट-पूर्व आर्थिक सर्वेक्षण और 29 फरवरी को आम बजट पेश होगा। मगर ध्यान असल में इस पर टिका रहेगा कि क्या इस अधिवेशन में नजारा पिछले मानसून और शीतकालीन सत्रों से अलग रहता है।

उन दोनों सत्रों में विपक्ष के हंगामे के कारण कोई अहम काम नहीं हुआ। जबकि अब कांग्रेस से लेकर जनता दल (यूनाइटेड) और सीपीएम तक ने इस मांग में स्वर मिलाया कि बजट सत्र की अवधि में कटौती नहीं की जानी चाहिए, तो इन दलों के सामने प्रश्न है कि उन्होंने ज्यादा समय संसदीय कामकाज को पूरा करने के लिए मांगा या हंगामे के लिए? अगर उन्होंने अपना नजरिया बदला है, तो यह स्वागतयोग्य बात होगी। लेकिन नए साल में भी संसद को सियासी टकराव का स्थल बनाया गया, तो यह निराशाजनक व्यवहार होगा।

निर्विवाद है कि देश की जनता ने सरकार चलाने की जिम्मेदारी भारतीय जनता पार्टी को दी है, तो यह सुनिश्चित करना भी उसका ही दायित्व है कि संसद सुचारु रूप से चले। लेकिन यह बात तब लागू होती है, जब विपक्ष सकारात्मक रुख के साथ चल रहा हो। ये बातें इसलिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि विपक्ष किन मुद्दों पर व्यवधान डालेगा, इसकी चर्चा अभी से शुरू हो गई है। कहा गया है कि हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या, अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने तथा बहुचर्चित हैलिकॉप्टर घोटाले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को फंसाने की प्रधानमंत्री की कथित कोशिश को लेकर विपक्ष संसद में हंगाम करेगा।

दरअसल, मकसद सिर्फ शोरगुल या हंगामा करना हो, तो उसके लिए मुद्दे रोजमर्रा के स्तर पर मिलते रहते हैं। मगर विपक्ष को चाहिए कि उनको आधार बनाकर वह संसद को फिर राजनीतिक रणक्षेत्र न बनाए। अर्थव्यवस्था को संभालने तथा विकास को रफ्तार देने के लिए जरूरी कई विधेयक संसदीय मंजूरी के इंतजार में हैं। इनमें जीएसटी बिल भी शामिल है। इन कार्यों को अब और नहीं लटकाया जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि विपक्ष को साथ लेने की अपनी तरफ से पूरी कोशिश करे। विपक्ष को इस पर सकारात्मक जवाब देना चाहिए। ऐसा हो, तो हम संसद के एक सार्थक सत्र की आशा कर सकते हैं।