विवेक श्रीवास्तव / अमित भटोरे, खरगोन। एक दशक से खरगोन लोकसभा पर भाजपा काबिज है। इस बार भाजपा ने अपने वर्तमान सांसद का टिकट काटकर नई चाल चली है। अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष को प्रत्याशी के रूप में पेश कर दिया। खरगोन सीट पर मुख्य मुकाबला कांग्रेस के गोविन्द मुजाल्दा और भाजपा के गजेन्द्र सिंह पटेल के बीच है।

पिछले 10 वर्षों से यह सीट आदिवासी के लिए आरक्षित है। इस सीट पर कभी लहर तो कभी उम्मीदें सवार हुईं। लोकसभा की इस सीट पर कई वे उम्मीदवार भी जीते जो वक्त के साथ राजनीति में दिग्गज बने।

इस लोकसभा अंतर्गत खरगोन व बड़वानी जिले की आठ विधानसभाएं शामिल हैं। बड़वानी जिले की बड़वानी, राजपुर, पानसेमल व सेंधवा, जबकि खरगोन जिले की खरगोन, भगवानपुरा, महेश्वर व कसरावद। 2009 में यहां मकनसिंह सोलंकी भाजपा से जीते। इसके बाद 2014 में सुभाष पटेल ने भाजपा सीट को बरकरार रखा। यह लोकसभा 1952 से अस्तित्व में है। यहां कांग्रेस के वैजनाथ महोदय पहले सांसद चुने गए थे।

दो बार बने बड़े रिकॉर्ड

इस लोकसभा सीट पर कई किस्से और मुद्दे चर्चित रहे। 2005 में भाजपा के दिग्गज व पूर्व प्रदेश संगठन मंत्री कृष्णमुरारी मोघे ने इंदौर से आकर यहां चुनाव लड़ा। बाहरी उम्मीदवार बताने के बावजूद उन्होंने यहां जीत हासिल की। 2007 में लाभ के पद के मामले में मोघे को सीट छोड़ना पड़ी। 2007 में उपचुनाव में पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव के बड़े बेटे अरुण यादव ने कांग्रेस से राजनीतिक जिंदगी की शुरुआत की।

यादव ने मोघे को एक लाख से अधिक मतों से पराजित किया। कांग्रेस ने यादव जैसे नए आकर्षक चेहरे के बल पर भाजपा से यह सीट छीन ली। परंतु यादव की किस्मत भी इस जिले में इससे आगे नहीं बढ़ी। 2009 में यह सीट परिसीमन में आकर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो गई। 2009 में यहां भाजपा के मकनसिंह सोलंकी चुनाव जीते। 2014 में सोलंकी का टिकट काटकर राजपुर के सुभाष पटेल को आजमाया। पटेल रिकॉर्ड सवा दो लाख मतों से जीते।

पटरियों ने पलटे परिणाम

यहां के मतदाता किस तरह ठगे गए उसका उदाहरण भी देखने को मिला। 1967 में दिल्ली से आकर शशिभूषण वाजपेयी भी कांग्रेस से चुनाव लड़े। क्षेत्रवासियों का आरोप रहा कि वाजपेयी ने कुछ खेतों में रेल की पटरियां डलवा दी। घोषणा की गई कि चुनाव जीतते ही खंडवा-खरगोन के बीच रेलवे लाइन बिछाई जाएगी। वाजपेयी चुनाव जीते। जीतने के बाद कभी लौटकर नहीं आए।

लोकसभा के प्रमुख मुद्दे

  • खरगोन मुख्यालय पर रेल का मुद्दा हर चुनाव में आता है।
  • कपास की उद्योग व निर्यात नीति भी मुद्दा बनती है।
  • शासकीय मेडिकल, इंजीनियरिंग व कृषि महाविद्यालय की मांग।
  • आदिवासी वन अधिकार पत्र भी राजनीतिक मुद्दा बनता है।
  • जिला मुख्यालय पर बायपास नहीं होने से यातायात प्रभावित।