विनोद सिंह, जगदलपुर। आदिवासी वर्ग के लिए सुरक्षित बस्तर संसदीय क्षेत्र की जनता जितनी शांत और सौम्य मानी जाती है, निर्णय लेने में उतनी ही कठोर है।

बस्तर संसदीय क्षेत्र का चुनावी इतिहास इस बात का गवाह है कि जिसे सांसद बनाया, उसे लगातार बनाया और जब एक बार नजरें फेरी तो फिर दोबारा उसे कभी सांसद नहीं बनाया। इसका परिणाम यह रहा कि सांसद का चुनाव हारकर नेताओं को या तो विधानसभा का रुख करना पड़ा या फिर राजनीति से ही तौबा करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

बस्तर के गांधी माने जाने वाले कांग्रेस के मानकूराम सोढ़ी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। पांच बार के विधायक और तीन बार के सांसद सोढ़ी को 1996 में सांसद का चुनाव हारने के बाद चुनावी राजनीति छोड़नी पड़ी। वर्ष 1998-99 से वर्ष 2011 में निधन होने तक सबसे अधिक लगातार चार बार सांसद बनने का श्रेय भाजपा के नेता स्वर्गीय बलीराम कश्यप को जाता है।

उनके बाद तीन बार सांसद बनने का श्रेय कांग्रेस के स्वर्गीय मानकूराम सोढ़ी को जाता है। सोढ़ी वर्ष 1984 से 1996 तक लगातार सांसद रहे। दो बार सांसद बनने का श्रेय बलीराम कश्यप के पुत्र वर्तमान सांसद दिनेश कश्यप को है। दिनेश वर्ष 2011 में पहली बार उपचुनाव लड़कर सांसद बने और दोबारा 2014 में जीते और आज भी सांसद हैं।

कांग्रेस के एक अन्य बड़े नेता रहे स्वर्गीय महेन्द्र कर्मा वर्ष 1996 में निर्दलीय सांसद बने। वर्ष 1998 के चुनाव में उन्हें कांकेर सीट से चुनाव लड़ाया गया लेकिन वे वहां हार गए। इसके बाद उन्होंने विधानसभा की राजनीति की, दोबारा सांसद का चुनाव लड़ने का मन नहीं बनाया।

आठ नेताओं को एक ही बार मिला सांसद बनने का मौका

वर्ष 1952 से लेकर 2014 के बीच बस्तर संसदीय सीट के लिए 16वीं लोकसभा के आम चुनाव और एक उपचुनाव में मिलाकर कुल 11 लोगों को सांसद बनने का मौका मिला। बलीराम कश्यप, मानकूराम सोढ़ी और वर्तमान सांसद दिनेश कश्यप को छोड़ दिया जाए तो बाकी कोई नेता दोबारा सांसद नहीं बना। जनता ने मुचाकी कोसा, सुरती किस्टिैया, लखमू भवानी, झाडूराम सुंदर, लंबोदर बलियार, डीपी शाह, लक्ष्मण कर्मा और महेन्द्र कर्मा को सिर्फ एक बार ही सांसद बनने का मौका दिया।

इन नेताओं में कुछ ने दोबारा चुनाव लड़ा लेकिन जनता ने इनसे एक बार नजरें फेर ली तो दोबारा नहीं देखा। इनमें इक्का-दुक्का नेता सांसद का चुनाव हारने के बाद विधायक बनने का प्रयास भी किए, लेकिन कर्मा को छोड़ कोई अन्य इसमें सफल नहीं हो पाया। विधायक से सांसद तक का सफर नेताओं ने किया लेकिन अधिकांश के लिए हारने के बाद दोबारा सांसद बनना तो दूर, विधायक बनना भी नसीब नहीं हुआ।