झाबुआ, नईदुनिया प्रतिनिधि। झाबुआ विधानसभा सीट पर कांग्रेस प्रत्याशियों को हरवाने वालों के खिलाफ कांग्रेस में ज्यादा समय तक निष्कासन की कार्रवाई चल नहीं पाती है। 2003, 2013 व अब 2018 के चुनाव के बाद यही कहानी दोहराई जा रही है। इन तीनों चुनावों में कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ कांग्रेसी ही ताल ठोककर मैदान में उतर गए। उन्होंने कांग्रेस को हरवाकर भाजपा को जितवा दिया। कांग्रेस ने दिखावे के लिए बागियों को पार्टी से निकाल दिया फिर थोड़े समय बाद ही उन्हें वापस पार्टी में ले लिया गया। झाबुआ सीट परंपरागत रूप से कांग्रेस की सीट मानी जाती है। यहां कांग्रेस हमेशा आगे रही है।

2003 में कांग्रेस ने पूर्व विधायक स्वरूप बेन भाबोर को अपना प्रत्याशी बनाया। उनके खिलाफ कांग्रेस के ही कांतिलाल बारिया ने बगावत कर दी। बारिया अलमारी चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में दो-दो हाथ करते रहे। मानसिंह मेड़ा जैसा दिग्गज नेता भी उनके समर्थन में रहा। बारिया के चुनाव पम्पलेट में मेड़ा का भी फोटो मौजूद रहा। इस बगावत के कारण भाजपा प्रत्याशी पवेसिंह पारगी का भोपाल जाने का रास्ता एकदम आसान हो गया है। 2013 में कांग्रेस ने अपने पूर्व विधायक जेवियर मेड़ा को प्रत्याशी बनाया। मेड़ा के खिलाफ सांसद भूरिया की भतीजी कलावती भूरिया ने बगावत कर दी। परिणाम यह रहा कि भाजपा प्रत्याशी शांतिलाल बिलवाल विधायक बन गए।

दिखावे के लिए पार्टी से निष्कासन हुआ। कुछ समय बाद वापस समर्थकों सहित कलावती कांग्रेस में आ गई। 2018 में कांग्रेस ने सांसद पुत्र डॉ. विक्रांत भूरिया को झाबुआ से अपना प्रत्याशी बनाया तो हल चुनाव चिन्ह लेकर पूर्व विधायक मेड़ा मैदान में कूद पड़े। मेड़ा व उनके समर्थकों ने खूब दम लगाया। फायदा भाजपा प्रत्याशी गुमानसिंह डामोर को मिला। मेड़ा व उनके साथियों का कांग्रस से निष्कासन हुआ। थोड़े ही दिन बीते हैं, मेड़ा समर्थक एकएक करके कांग्रेस के लिए वापस सक्रिय होते जा रहे हैं। अब तो स्वयं मेड़ा अपने समर्थकों सहित कांग्रेस में वापस शामिल हो गए हैं।