धनंजय प्रताप सिंह। लोकसभा चुनाव के सातवे और आखिरी चरण में 19 मई, रविवार को 59 सीटों पर वोटिंग होगी। इनमें मध्यप्रदेश की आठ सीटें भी शामिल हैं। ये सीटे हैं - देवास, उज्जैन, मंदसौर, रतलाम, धार, इंदौर, खरगोन, खंडवा। मध्यप्रदेश के इस मालवा-निमाड़ अंचल में भाजपा अपने गंवाए गढ़ को दोबारा हासिल करने के लक्ष्य के साथ चुनावी मैदान में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। विधानसभा चुनाव 2018 में भाजपा को सर्वाधिक नुकसान मालवा-निमाड़ क्षेत्र में हुआ था। यहां की 66 सीटों में से लगभग 56 सीटें भाजपा के पास हुआ करती थीं, जो आधे से भी कम पर सिमट गईं। खासतौर से मजबूत जनाधार वाले आदिवासी बेल्ट धार, खरगोन, झाबुआ में भी भाजपा को भारी शिकस्त मिली थी। अब लोकसभा चुनाव में भाजपा कोशिश कर रही है कि मालवा-निमाड़ में भाजपा का जनाधार वापस लाया जा सके। जानिए हर सीट का समीकरण -

1. इंदौर में रोचक मोड़ : भाजपा के मजबूत किले इंदौर में प्रियंका गांधी के रोड शो के बाद से मुकाबला रोचक हो गया है। भाजपा ने पहली बार 1989 में इंदौर सीट जीती थी, इसके बाद से जीत का यह सिलसिला लगातार जारी है। इंदौर से लगातार आठ बार सांसद रही सुमित्रा महाजन का टिकट काटकर भाजपा ने शंकर लालवानी को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने इस सीट पर पंकज संघवी को उतारा है। विधानसभा चुनाव के बाद इंदौर के राजनीतिक समीकरण भी बदल गए हैं। यहां की आठ में से कांग्रेस और भाजपा दोनों के पास चार-चार सीटें हैं।

2. धार में कब्जा बनाए रखना : धार सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। इस सीट पर भाजपा ने सावित्री ठाकुर का टिकट काटकर छतरसिंह दरबार को उतारा है। कांग्रेस से दिनेश गिरवाल चुनावी मैदान में हैं। जय युवा आदिवासी शक्ति 'जयस' के कारण विधानसभा चुनाव के बाद से इससीट पर समीकरण बदल गए हैं। यहां आठ विधानसभा सीटों में से छह कांग्रेस और दो पर भाजपा का कब्जा है। भाजपा पूरी कोशिश कर रही है कि यहां अपना कब्जा बरकरार रख सके।

3. मंदसौर में फिर मीनाक्षी की परीक्षा : मंदसौर लोकसभा सीट से भाजपा ने मौजूदा सांसद सुधीर गुप्ता को फिर से मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस ने एक बार फिर मीनाक्षी नटराजन पर ही भरोसा जताया है। 2014 में इन्हीं दोनों नेताओं के बीच सियासी जंग हुई थी और सुधीर गुप्ता ने नटराजन को करीब तीन लाख मतों से मात दी थी। विधानसभा चुनाव के लिहाज से देखें तो मंदसौर संसदीय सीट के तहत आठ विधानसभा सीटें आती हैं, इनमें से सात भाजपा और एक कांग्रेस के पास है।

4. उज्जैन में सीधा मुकाबला : महाकाल की नगरी उज्जैन में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है। भाजपा ने सांसद चिंतामणि मालवीय की जगह इस बार अनिल फिरोजिया को मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने बाबूलाल मालवीय को मैदान में उतारकर लड़ाई को दिलचस्प बना दिया है। यहां की आठ विधानसभा सीटों में से पांच पर कांग्रेस का कब्जा है और तीन पर भाजपा का।

5. रतलाम में कांटे का मुकाबला : कांग्रेस का मजबूत गढ़रतलाम-झाबुआ में आदिवासी चेहरा कांतिलाल भूरिया एक बार फिर मैदान में हैं, जबकि भाजपा ने जीएस डामोर को प्रत्याशी बनाया है। 2014 में मोदी लहर में भाजपा के दिलीप सिंह भूरिया यहां से सांसद चुने गए थे, लेकिन एक साल बाद ही उनका निधन हो गया और बाद में हुए उपचुनाव में कांतिलाल भूरिया भाजपा से यह सीट छीनने में कामयाब रहे। रतलाम-झाबुआ संसदीय सीट के तहत आठ विधानसभा सीटें आती हैं। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में इन आठ में से पांच कांग्रेस और तीन भाजपा ने जीती थी।

6. खरगोन को बचाने में जुटी भाजपा : इस लोकसभा सीट पर भाजपा ने सुभाष पटेल का टिकट काटकर गजेंद्र सिंह पटेल पर भरोसा जताया है। जबकि कांग्रेस ने डॉ. गोविंद मुजाल्दा को मैदान में उतारा है। 2014 में भाजपा के सुभाष पटेल ने करीब ढाई लाख मतों से जीत हासिल की थी। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस इस इलाके में बड़ी सेंध लगाने में कामयाब रही है। यहां की आठ विधानसभा सीट में से छह सीटें कांग्रेस ने जीती थ। जबकि महज एक सीट भाजपा और एक सीट पर निर्दलीय ने कब्जा जमाया था।

7. खंडवा में कांटे का मुकाबला : खंडवा लोकसभा सीट पर भाजपा ने नंदकुमार सिंह चौहान परएक बार फिर भरोसा जताया है, जबकि कांग्रेस ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव को उतारा है। 2014 में मोदी लहर में चौहान ने अरुण यादव को तीन लाख से ज्यादा मतों से हराया था। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा ने चार-चार सीटों पर जीत दर्ज की है। ऐसे में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे का मुकाबला

8. देवास में दोनों नए चेहरे : अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित देवास सीट पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने नए चेहरे उतारे हैं। कांग्रेस ने पद्मश्री और कबीरपंथी भजन गायक प्रहलाद सिंह टिपानिया पर दांव लगाया है तो भाजपा ने पूर्व जज महेंद्र सिंह सोलंकी को मैदान में उतारा है। दोनों ही पार्टियों के प्रत्याशी अपनी राजनीतिक पारी का आगाज लोकसभा चुनाव से कर रहे हैं। 2008 में बनी इस संसदीय सीट पर 2009 के चुनाव में कांग्रेस के सルान सिंह वर्मा ने जीत हासिल की थी। उन्होंने थावरचंद गहलोत को हराया था। 2014 में मोदी लहर में भाजपा के मनोहर ऊंटवाल ने यह सीट छीन ली थी। देवास सीट के तहत आठ विधानसभा सीटें आती हैं, जिनमें से चार कांग्रेस और चार भाजपा के पास है।