धनंजय प्रताप सिंह, भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा लोकप्रिय चेहरा होने के बावजूद मध्यप्रदेश में सियासी तौर पर भाजपा शुरुआती तैयारियों में पिछड़ती नजर आ रही है। चुनावी तैयारियों से लेकर प्रत्याशियों की घोषणा में कांग्रेस भाजपा से आगे निकल गई है। प्रत्याशियों को लेकर भी भाजपा में कई सीटों पर विरोध चल रहा है। भाजपा को बागी भी परेशान कर रहे हैं। विधानसभा चुनाव की तरह इस चुनाव में भी कार्यकर्ताओं के उत्साह में कमी है। लगातार उपेक्षा के कारण कार्यकर्ता घर बैठ गए हैं।

भाजपा सरकार में मंत्री रहे कई नेता, जो कल तक भाग्यविधाता कहलाते थे, ऐसे पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक अब मैदान में सक्रिय नहीं हैं। जीते हुए विधायक भी लोकसभा चुनाव के लिए अब तक प्रचार में नहीं उतरे हैं। संगठन और बड़े नेता अभी भी ठीक वैसे ही आत्ममुग्ध हैं, जैसे 15 साल के शासन के दौरान हुआ करते थे। हालात ऐसे हैं कि समय रहते ठीक नहीं किया तो पार्टी को लोकसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है।

2014 की तरह उत्साह नहीं

वर्ष 2008, 2013 के विधानसभा चुनाव हों या 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं के उत्साह की बात हो, तो उस दौरान कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा था। वो जोश-जुनून इस लोकसभा चुनाव में नजर नहीं आ रहा है। वे 2018 के चुनाव की पराजय के सदमे से उबर नहीं पाए हैं।

टिकट वितरण में देरी

भाजपा ने टिकट वितरण में भी देरी की। कांग्रेस ने भोपाल की सीट 25 दिन पहले घोषित कर दी थी, लेकिन भाजपा ने नामांकन शुरू होने के बाद एलान किया। अभी भी भाजपा की 28 सीट ही घोषित की गई हैं। इंदौर सीट पर भाजपा प्रत्याशी तय नहीं कर पाई है।

टिकट वितरण से कार्यकर्ता खुश नहीं

खास बात ये है कि इस चुनाव में भाजपा द्वारा बांटे गए टिकट से कार्यकर्ता नाराज हैं। कई सीटों पर ऐसे हालात बने हैं। बालाघाट लोकसभा क्षेत्र से सांसद बोधसिंह भगत निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं और पार्टी कार्यकर्ताओं का एक बड़ा तबका अधिकृत प्रत्याशी डॉ. ढाल सिंह बिसेन को छोड़ भगत का प्रचार कर रहा है। यही हाल खजुराहो सीट पर है। पार्टी ने लंबे समय से स्थानीय प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया। परिणाम ये है कि संसदीय सीट में तीन जिले आते हैं, तीनों में ही पार्टी के लोग अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ खड़े हैं। विदिशा में विधानसभा चुनाव में शिवराज समर्थक मुकेश टंडन को टिकट दी थी पर भाजपा का गढ़ होने के बाद भी कार्यकर्ताओं ने उन्हें हरवा दिया। अब फिर पार्टी ने उनके समर्थक रमाकांत भार्गव को टिकट दे दिया।

यही हाल सागर सीट का भी है। गुना सीट से भाजपा ने जिस डॉ. केपी यादव को प्रत्याशी बनाया है। वह कुछ ही दिन पहले भाजपा में आए थे। पहले वे कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के सांसद प्रतिनिधि हुआ करते थे। यादव का क्षेत्र में जबरदस्त विरोध हो रहा है। इसकी वजह कार्यकर्ताओं पर प्रत्याशी थोपा जाना है।

मैदानी तैयारियां लगभग नदारद

प्रदेश में पहले चरण के मतदान में दो हफ्ते भी नहीं बचे हैं पर पार्टी की मैदानी तैयारी कमजोर नजर आ रही है। 'एक बूथ, दस यूथ" , 'मेरा बूथ सबसे मजबूत" जैसे हवा में तैरने वाले नारे और तैयारियां गायब हैं। पार्टी के नेता कह रहे हैं कि कांग्रेस को कमजोर आंक कर भाजपा अति आशावाद का शिकार हो गई है। नेताओं ने मान लिया है कि मोदी का चेहरा ही पर्याप्त है। दिग्गज नेताओं की मानें तो इस चुनाव में भाजपा को जीत के लिए ज्यादा मेहनत करना पड़ेगी।

जातिवाद को आधार बनाने से नाराज

कार्यकर्ताओं की नाराजी की मुख्य वजह हर सीट पर जातिवाद के आधार पर टिकट बांटना है। हर सीट पर बड़े नेताओं ने खुद के समर्थक को उपकृत करने के लिए जातिवाद की आड़ ले ली। सागर में लक्ष्मीनारायण यादव का टिकट काटा तो गुना में यादव उतार दिया। वीडी शर्मा को भोपाल से टिकट नहीं देकर खजुराहो भेजा तो जातिवाद का हवाला देकर विदिशा में ब्राह्मण प्रत्याशी खड़ा कर दिया। जबकि यह सीट ऐसी मानी जाती है कि किसी भी जाति के कार्यकर्ता को भी खड़ा कर दो तो भी भाजपा ही जीतेगी। क्षत्रिय बाहुल्य विंध्य इलाके में किसी क्षत्रिय को टिकट नहीं दिया। सामान्य सीट छिंदवाड़ा से आदिवासी को टिकट दे दिया तो सवर्ण वर्ग नाराज हैं। राजगढ़ में भी कार्यकर्ता प्रत्याशी रोडमल नागर के विरोध में हैं।

हर पहलू पर दिया ध्यान

भाजपा के मुख्य प्रवक्ता डॉ. दीपक विजयवर्गीय का कहना है कि केंद्रीय चुनाव समिति ने प्रदेश नेतृत्व के परामर्श से हर सीट पर प्रत्याशी तय किए हैं। चयन में प्रदेश नेतृत्व के साथ परामर्श में सभी पहलुओं का ध्यान रखते हुए फैसले लिए गए हैं।