अंबुज माहेश्वरी, रायसेन। विदिशा-रायसेन संसदीय क्षेत्र के नेताओं और कार्यकर्ताओं की लंबे समय से चली आ रही स्थानीय प्रत्याशी की मांग ने शायद असर दिखा दिया है। चुनाव के लिए क्षेत्र के भाजपा संगठन ने आलाकमान को प्रत्याशी चयन के लिए नामों का जो पैनल भेजा है उसमें क्षेत्र के पूर्व सांसद शिवराज सिंह चौहान और उनकी धर्मपत्नी भाजपा नेत्री साधना सिंह का नाम वरीयता पर है। इनके अलावा पैनल में उदयपुरा की पूर्व विधायक शशिप्रभा सिंह राजपूत और बुदनी के पूर्व विधायक राजेंद्र सिंह राजपूत का नाम भी शामिल है। गौरतलब है कि क्षेत्रीय सांसद सुषमा स्वराज अब चुनाव लड़ने से इनकार कर चुकी है। वे लगातार 10 सालों से क्षेत्र की सांसद है।

भाजपा के गढ़ के रूप में ख्यात इस सीट को फिर अपने कब्जे में बनाए रखने के लिए भाजपा यहां कोई रिस्क नहीं लेना चाहती है। इसलिए अभी तक शिवराज और उनकी पत्नी के नाम को ही प्राथमिकता में रखकर विचार चल रहा है। 8 में से 6 विस सीटों पर हैं भाजपा विधायक विदिशा संसदीय क्षेत्र में चार जिलों की 8 विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें से 6 पर भाजपा के विधायक काबिज हैं।

जबकि सांची और विदिशा में कांग्रेस के विधायक हैं। पूरे संसदीय क्षेत्र के भाजपा कार्यकर्ता इस बार शुरू से ही स्थानीय उम्मीदवार की मांग करते आ रहे हैं, चाहे वह विदिशा संसदीय क्षेत्र में कहीं का भी रहने वाला हो। कई बार संगठनों की बैठक में यह बात खुलकर भी रख चुके हैं। इसका मुख्य कारण सांसद तक आम जनता की पहुंच सुनिश्चित करना है।

ये हैं ताकत और कमजोरी

शिवराज सिंह चौहान

ताकत

- वर्ष 1991 से 2006 तक लगातार 5 बार क्षेत्र के सांसद रहे।

- क्षेत्र में कार्यकर्ताओं और जनता से सीधा संवाद न सीएम बनने के बाद भी क्षेत्र में सतत संपर्क में रहे।

- सांसद रहते कई बार जनता के हित में आंदोलन न सीएम रहते कई बड़े विकास कार्य कराए।

कमजोरी

- बीते 10 वर्षों में संसदीय क्षेत्र में कार्यकर्ताओं की उपेक्षा।

- विस चुनाव में भाजपा के गढ़ सांची और विदिशा में कांग्रेस की जीत।

- सरकार में होने से भाजपा की तुलना में कांग्रेस कार्यकर्ता ज्यादा उत्साहित।

साधना सिंह चौहान

ताकत

- शिवराज सिंह चौहान की पत्नी होने के अलावा खुद की अलग पहचान बनाई।

- किरार समाज की राष्ट्रीय अध्यक्ष, महिलाओं में गहरी पैठ।

- महिला मोर्चा में सक्रिय रहकर संगठन में काम किया।

कमजोरी

- ये प्रत्याशी बनीं, तो कांग्रेस परिवारवाद का मुद्दा उछाल सकती है।

- राजनीतिक जीवन में खुद चुनाव लड़ने का तजुर्बा नहीं है।

- क्षेत्र में भाजपा कार्यकर्ताओं में व्याप्त असंतोष को दूर करना बड़ी चुनौती है।