भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में मां बेटे पर बाप बेटों पर ढेरों फिल्में बन चुकी हैं लेकिन उसका आयाम त्याग, बलिदान और ममता के इर्द-गिर्द घूमता रहा। बदलते हालात में हम सभी की मानसिकता में भी बदलाव आया है और यह बदलाव रिश्तों पर भी झलकता है और जाहिर तौर पर रिश्तों का लगातार इवॉल्व होना भी जरूरी है। हेलीकॉप्टर ईला अपनी तरह की पहली फिल्म है जहां पर मां बेटे के रिश्तों में बदलते समय के हिसाब से स्पेस की डिमांड की गई हो।

यह कहानी है एक सिंगल मदर ईला और उसके बेटे विवान की। ईला बेटे विवान की जरूरत से ज्यादा केयर करती है। यह दोनों मां-बेटे अपनी जिंदगी में काफी खुश हैं लेकिन जैसे-जैसे बेटा बड़ा होते जाता है उसे इस जरूरत से ज्यादा देखभाल की, प्यार की, घुटन महसूस होने लगती है और वो इससे छुटकारा पाना चाहता है। ऐसा नहीं है कि वह अपनी मां से प्यार नहीं करता मगर वह अपने संसार को मां से अलग जीना चाहता है। तो ऐसे में इला अपनी ही खोज मैं निकल पड़ती है। इसी एक खूबसूरत धागे से फिल्म बुनी गई है। कहानी के नाम पर निर्देशक प्रदीप सरकार के पास सिर्फ एक ही यह वन लाइनर था l कहानी पर थोड़ी और मेहनत की जाती तो फ़िल्म एक अलग आयाम पर होती। स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स का के सहारे फिल्म आगे बढ़ी है मगर कहानी ठहर जाती है। हालांकि सरकार ने बड़ी खूबसूरती के साथ इस रिश्ते का एहसास पूरी फिल्म में कराया है। मगर फिल्म के एक किरदार के अतार्किक होते ही फिल्म अपनी ही विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर देती है।

फिल्म में सरकार ने बहुत ही फास्ट एडिटिंग रखी है। सिनेमैटोग्राफी में ग्लॉस रखा गया है ताकि दृश्य और खूबसूरती से सामने आए। अभिनय की बात करें तो एक ओवर पजेसिव मां के रूप में काजोल पूरी तरह से सफल नजर आती है। वैसे भी उन्हें पर्दे पर देखना हमेशा ही सुखद होता है। वहीं रिद्धी सेन उनके बेटे के रूप में पूरी तरह स्थापित हो जाते हैं। कुछ समय बाद यू लगने लगता है कि सचमुच के मां बेटे हैं।

तोता रॉय चौधरी, नेहा धूपिया और जाकिर हुसैन अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं। स्वानंद किरकिरे के बोलों पर अमित त्रिवेदी राघव बहल ने खूबसूरत संगीत दिया है। कुल मिलाकर हेलीकॉप्टर ईला एक सामान्य पारिवारिक फिल्म है जिसका आनंद आप चाहे तो ले सकते हैं।

- पराग छापेकर