लेजेंडरी एक्टर कमल हासन की फिल्म 'विश्वरूपम 2' इंतजार सीने प्रेमी बेसब्री से कर रहे थे। इस फिल्म की खासियत यह है यह तमिल के साथ-साथ हिंदी में भी शूट हुई है। किसी तरह की डबिंग का इस्तेमाल नहीं किया गया है! उम्मीद के मुताबिक कमल हसन ने एक निर्माता-निर्देशक के तौर पर एक भव्य फिल्म का निर्माण किया है। किसी तरह की कोई कसर निर्माण के दौरान नहीं छोड़ी सिवाय कहानी के।

एक बड़ी कमर्शियल फिल्म निश्चित तौर पर एक सपने की तरह होती है, जिसमें आप खो जाते हो लेकिन कॉमिक्स पढ़ने में और सिनेमा देखने में फर्क होता है। कॉमिक्स में भी चीजें आपको समझ में तो आती हैं। आप पिक्चर्स देख कर टूटे-फूटे डायलॉग्स के सहारे चीजें समझ भी जाते हैं मगर उसमें डिटेलिंग का अभाव होता है। इसीलिए सिनेमा बनता है। सिनेमा की पटकथा में हर चीज बारीकी से दर्शाई जाती है। आप का नायक किसी एक तरह का क्यों है।

उसके पीछे एक कहानी होती है। बस इतने से फर्क में विश्वरूपम 2 मार खा जाती है। कमल हसन ने ग्रैंड फिल्म तो बनाई मगर उसे कॉमिक्स के अंदाज में बनाया। डिटेलिंग का अभाव फिल्म में साफ नजर आता है। विश्वरूपम भाग 1 की तरह इसमें भी कमल हासन रॉ की स्लीपर सेल के एजेंट हैं और इस बार आतंकवादियों की लंदन तबाह करने की साजिश को ना काम करते हैं! ओसामा बिन लादेन को मारने के प्लान में अमेरिका का साथ देते हैं और अंततः सभी को खत्म करके विजय घोषित होते हैं। यही कहानी है विश्वरूपम पार्ट 2 की।

अभिनय की बात करें तो निश्चित तौर पर कमल हासन बाजी मार ले जाते हैं। उन्हें देखना सुखद होता है मगर निर्देशक कमल हासन ने सुपरस्टार कमल हासन से कैमरा ऐसा चिपकाया कि दूसरे कलाकारों पर कैमरा थोड़ा कम ही जा पाया। निरुपमा बनी पूजा कुमार भले ही अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा में नाम करके आई हों मगर इस फिल्म में उनकी परफॉर्मेंस फिल्म को नीचे की ओर ले जाती है ! एक एक्टर को दृश्य के स्वर को समझना जरूरी होता है। अन्यथा एक संवेदनशील दृश्य भी कॉमिक बन जाता है, यही पूजा के साथ हुआ।

अस्मिता सुब्रमण्यम बनी एंड्रिया ने अपना किरदार बहुत ही सहजता से निभाया। शेखर कपूर एक माने हुए निर्देशक हैं मगर एक अभिनेता के तौर पर पूरी फिल्म में ऊर्जाहीन नजर आए। जिस स्टेटस पर वह हैं, वहां इस तरह की परफॉर्मेंस माफ नहीं की जा सकती। वहीदा रहमान जैसी लेजेंडरी एक्ट्रेस फिल्म में जरूर हैं और उन्होंने एक समर्थ कलाकार होने के नाते शानदार परफॉर्मेंस भी दी। मगर उनके कैरेक्टर डिजाइन में निर्देशक कमल हासन मात खा गए। वहीदा रहमान का किरदार अल्जाइमर से पीड़ित है मगर वह पागल नहीं हैं कि सामने मारधाड़ चल रही है। गोलियां चल रही हैं। खून बह रहा है और उसका असर इस किरदार पर ज़रा भी नहीं पड़ता।

इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह कमल हासन की फिल्म है जिसमें किसी तरह की कमी कि आप अपेक्षा ही नहीं कर सकते! उसका परफेक्ट होना ही जरूरी है! मगर यह हो न सका। कुल मिलाकर अगर आप कमल हासन के मेरी तरह हार्डकोर फैन हैं तो आप यह फिल्म देखने जा सकते हैं। अन्यथा मनोरंजन के दूसरे साधन अपनाए जा सकते हैं।

- पराग छापेकर