अहमदाबाद। गुजरात के चुनावी दंगल के दूसरे दौर के मतदान के साथ ही मुकाबले में आमने-सामने दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं की दिल की धड़कनें तेज हो गई हैं। सूबे की सत्ता बचाने और छीनने की लड़ाई इतनी जबर्दस्त है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अंतिम दौर के 93 सीटों पर अपनी राजनीतिक रणनीति और कुशलता के सारे दांव लगा दिए हैं।

दूसरे चरण के चुनाव अभियान के दौरान दोनों खेमों की ओर से एक दूसरे पर किया गया धुआंधार सियासी प्रहार इस बात का संकेत माना जा रहा कि गुजरात का यह चुनाव फर्राटा दौड़ के फोटो-फिनिश सियासी क्लाइमेक्स की स्थिति तक पहुंच सकता है।

हालांकि, भाजपा अब भी पिछली से बड़ी जीत को लेकर आश्वस्त है, जबकि एक दिन पहले ही राहुल गांधी जबर्दस्त जनादेश की बात कर चुके हैं।

भाजपा बड़े शहरों और खासकर मध्य गुजरात में अब भी बरकरार अपनी गहरी पैठ के सहारे सत्ता हाथ से नहीं जाने देने की पूरी उम्मीद कर रही है। तो कांग्रेस राज्य सरकार के प्रति नाराजगी और हार्दिक, अल्पेश व जिग्नेश जैसे युवा तुर्कों की नाव पर सवार होकर वैतरणी पार करने की उम्मीदें लगा रही है।

इस लिहाज से गुरुवार को मध्य और उत्तर गुजरात का जनादेश सत्ता का संतुलन तय करने में बेहद अहम होंगे। इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस ने इस चुनाव में अपने सामाजिक समीकरण और रणनीतिक दांवों के जरिए भाजपा के लिए मुश्किल चुनौती पेश की है।

मगर भाजपा और संघ के संगठन की ताकत के चलते कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल को सत्ता विरोधी लहर के रूप में तब्दील करती नहीं दिखी।

वडोदरा और अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों में जहां अकेले 26 सीटें हैं, वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और संगठन की ताकत के सहारे भाजपा अपनी जमीन बचाने की स्थिति में है।

मध्य गुजरात में कमोबेश अपनी ताकत बरकार रखने की दोनों पार्टियों की स्थिति से साफ है कि सत्ता का फैसला उत्तर गुजरात की चुनावी करवट से तय होगा।

मध्य में पिछले चुनाव में भाजपा ने 20 और कांग्रेस ने 18 सीटें जीती थीं। उत्तर की 53 सीटों के वोटिंग पैटर्न से सत्ता इसलिए भी तय होगी, क्योंकि यह सूबे की राजनीतिक प्रयोगशाला का सबसे प्रमुख केंद्र भी है।

हार्दिक पटेल के अनामत आंदोलन से लेकर ओबीसी की सियासत करने वाले अल्पेश ठाकोर और दलित समुदाय के मुखर चेहरे के रूप में सामने आए जिग्नेश मेवाणी सबकी राजनीति का केंद्र उत्तर गुजरात ही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सूबे के भाजपा दिग्गज आनंदी बेन पटेल और नितिन पटेल इसी क्षेत्र से आते हैं। गुजरात के मौजूदा चुनाव के एक्स फैक्टर माने जा रहे अनामत आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल के सियासी उफान का केंद्र भी यही इलाका है।

इन चेहरों का उत्तर गुजरात से सीधा जुड़ाव यह बताने के लिए काफी है कि इस इलाके में लड़ाई कितनी जबर्दस्त है।

2012 के चुनाव में उत्तर गुजरात में भाजपा के खाते में 32 सीटें आईं, तो कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थीं। दक्षिण गुजरात के आदिवासी बहुल इलाकों में भाजपा की पैठ मजबूत है और पिछले चुनाव में कांग्रेस के 6 के मुकाबले भाजपा का 28 सीट जीतना यह बताने के लिए पर्याप्त है।

कांग्रेस ने छोटू बसावा की बीटीपी से समझौता कर भाजपा की एसटी सीटों की ताकत में सेंध लगाने का दांव चला है। गुजरात के मौजूदा चुनाव में वोटिंग पैटर्न का अध्ययन कर रहे चुनावी विशेषज्ञ वीएमआर के डायरेक्टर तडित प्रकाश कहते हैं कि हार्दिक जितनी ज्यादा सीटों पर असर डालेंगे कांग्रेस की संभावनाएं उतनी बढ़ेंगी।

मगर जमीनी वास्तविकता है कि अपने संगठन की सीमाओं के चलते कांग्रेस को सत्ता विरोधी माहौल का जितना फायदा उठाना चाहिए था, उतना नहीं उठा सकी है। प्रकाश की राय में उत्तर में कई सीटें ऐसी हैं, जो कांग्रेस पहले से जीतती रही है।

हार्दिक फैक्टर से इसमें मार्जिन बढ़ जाएगा। लेकिन उस अनुपात में सीटों की संख्या में इजाफा होता नहीं दिख रहा। कांग्रेस के लिए सत्ता के ताले की चाभी तभी खुलेगी जब भाजपा की परंपरागत सीटों को भी हार्दिक शिफ्ट कर दें।

चुनावी विशेषज्ञों से इतर पार्टियां एक-एक सीट का आकलन रही हैं और इनके रणनीतिकार भी चुनावी नतीजों के फोटो फिनिश जैसे हालत की संभावना से इनकार नहीं कर रहे।