श्रवण शर्मा, बालाघाट (जबलपुर)। नक्सलियों का नाम आते ही जहां लोग डरकर रास्ता बदल लेते हैं, वहां एक नारी अपने कराते के बल पर सबको चुनौती देती है। वह महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाने में जुटी है। इसके लिए वह जंगल के रास्तों की भी परवाह नहीं करती। नक्सल प्रभावित गांवों में जाकर आदिवासी बच्चियों और किशोरियों को आत्मरक्षा के लिए जूडो-कराते सिखाती है।

बीते 10 साल में उसने 3 हजार से ज्यादा बेटियों को प्रशिक्षित किया है। नारी सशक्तिकरण को धार देने वाली यह नारी वर्षा चंदेलवार (35) हैं। वह मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित लांजी ब्लॉक के हट्टा गांव में रहती हैं। वर्षा कहती हैं कि इस कार्यक्रम का मकसद सिर्फ एक है कि बेटियों को इतना प्रशिक्षित कर दिया जाए कि वह हर हालता में सामना कर सकें। उन्हें लगे कि हारना नहीं, हराना है।

सुरक्षित होंगी तो और बुराइयों से लड़ सकेंगी

वर्षा के मुताबिक आत्मरक्षा का गुर सीखने के बाद बेटियों में समाज में फैली अन्य बुराइयों से लड़ने में आसानी होगी। वह बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ और शराबबंदी को लेकर आवाज उठा सकेंगी। युवती और महिलाएं आत्मरक्षा के गुर सीख जाएंगी तो उनमें न केवल आत्म निर्भरता बढ़ेगी बल्कि वे समाज में अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का विरोध कर सकेंगी। लांजी में ऐसे गांव है कि वहां पर कोई घटना हो जाए तो दूसरे दिन ही पुलिस वहां पहुंच पाती है। इस स्थिति में महिलाओं को सबसे पहले असुरक्षा की भावना आती है। नारी सशक्तिकरण की पहली शर्त ही आत्मरक्षा है।

शुरुआत में दिक्कत आई, लेकिन हार नहीं मानी

वर्षा ने जब कराते सिखाने की शुरुआत की तो उन्हें शुरुआत में दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा। परिवार वाले अपनी बेटियों को भेजने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने इसका मकसद समझाया। धीरे-धीरे परिवार वालों की यह समझ में आ गया और वे अपनी बेटियों को कैंप में भेजने लगे।

3 हजार से अधिक युवतियों को दिया प्रशिक्षण

वर्षा चंदेलवार स्नातकोत्तर की शिक्षा हासिल करने के साथ ही पैरामेडिकल से योगा व कम्प्यूटर की भी प्राप्त की है। खेल के क्षेत्र में उसने कराते में ब्लैक बेल्ट प्राप्त किया है। पहले खुद कराते सीखा और अब आदिवासी युवतियों को सिखा रही हैं। अब तक करीब 3 हजार से अधिक बच्चियों और किशोरियों को प्रशिक्षण दे चुकी हैं।