बैतूल (विनय वर्मा)। पुरुष प्रधान समाज में किसी घर की पहचान घर की बेटी के नाम पर हो, यह बात अभी भी मुमकिन नहीं लगती। इसी विडंबना को तोड़कर बेटियों के नाम पर घर की पहचान कराने के लिए बैतूल का एक युवा बीते तीन साल से अभियान चला रहा है। वह स्वयं के खर्च पर बेटियों की नेम प्लेट बनाकर खुद उनके घर पहुंच कर उपहार देते हैं। फिर नेम प्लेट को घर के बाहर लगाते भी हैं। शहर से शुरू हुआ उनका अभियान अब तक देश के आठ राज्यों तक पहुंच चुका है। इस अवधि में वे 1600 से अधिक नेम प्लेट लगा चुके हैं।

शहर के सदर क्षेत्र के निवासी अनिल यादव को शुरू से ही यह बात खटकती थी कि ज्यादातर घरों की पहचान केवल उस घर के पुरुष सदस्य के नाम से ही होती है। उनकी सोच थी कि महिला-पुरुष को बराबरी का हक देने की बातें तो होती हैं, लेकिन बात जब घर और परिवार की पहचान की होती है तो यह विशेषाधिकार केवल और केवल पुरुष सदस्य को ही हासिल होता है।

बेटियों को यह शुरुआती महत्व नहीं मिलने से ही उनकी उपेक्षा लगातार बढ़ती जाती है और समाज में उन्हें वह मान-सम्मान हासिल नहीं हो पाता है, जिसकी वे हकदार होती हैं। इसलिए उन्होंने इस परंपरा को तोड़ने का संकल्प लिया। इस संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने यह तरीका निकाला कि वे किसी भी परिवार में बेटी के जन्मदिन पर तोहफे के रूप में उसके नाम पर बनी नेम प्लेट देंगे और स्वयं उसके घर जाकर लगाएंगे। वर्ष 2015 में अपनी बेटी के जन्मदिन पर अपने घर से ही उन्होंने इस अभियान की शुरूआत की। इसके बाद सबसे पहले बैतूल शहर में उन्होंने बेटी के नाम की नेम प्लेटें लगाईं और यहां से उन्हें अच्छा समर्थन और प्रशंसा मिलने पर वे लगातार अपना दायरा बढ़ाते रहे।

पहुंच चुके हैं आठ राज्यों तक

अनिल अपने अभियान को पूरे देश में फैलाना चाहते हैं। अभी तक उनका अभियान मध्य प्रदेश के विभिन्ना शहरों और गांवों के अलावा छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली, पंजाब राज्यों के विभिन्ना शहरों तक पहुंच चुका है। वे अभियान के तहत अभी तक स्वयं के खर्च पर 1600 से ज्यादा बेटियों को उपहार में नेम प्लेट देकर उनके घर पहुंचकर लगा भी चुके हैं।

खंडारा गांव में हर घर बेटी के नाम पर

अनिल के इस अभियान का ही असर है कि बैतूल जिला मुख्यालय के समीप स्थित खंडारा गांव में हर घर में बेटी के नाम की नेम प्लेट लग चुकी है। इस गांव के लोग तो उनके इस अभियान से इतने खुश हुए कि उन्होंने यह ऐलान तक कर दिया कि अब गांव की ही किसी प्रतिभाशाली बेटी के नाम से गांव के मंगल भवन का नाम भी रखा जाएगा। जनप्रतिनिधि भी उनके इस अभियान की खासी प्रशंसा कर चुके हैं।

आमदनी कम, लेकिन बेटियों के लिए दिल बड़ा

देश भर में स्वयं के खर्च पर यह अभियान चला रहे अनिल की आमदनी कोई बहुत अधिक नहीं है। कुछ समय तक उन्होंने सेंट्रल स्कूल में अस्थायी सुरक्षा गार्ड की नौकरी की थी, लेकिन एक साल बाद उनकी नौकरी चली गई। इसके बाद से वे अपना स्वयं का पान का ठेला चलाकर अपना परिवार पालने के साथ यह अभियान भी चला रहे हैं।