शशिकांत तिवारी, भोपाल। इटारसी के रहने वाले 17 साल के एक छात्र को रोजाना 17 घंटे इंटरनेट में गेम

खेलने की लत है। गेम भी बंदूक चलाने व गोलियों से बचने का। माता-पिता ने इस तरह का गेम खेलने से मना किया तो बच्चा नाराज हो गया है। कई दिन तक किसी से बात नहीं की। अभिभावकों ने बच्चे को बंसल अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी को दिखाया। उन्होंने बच्चे व माता-पिता की काउंसलिंग की।

बच्चे को दवाएं भी दीं। यह कोई एक केस नहीं है। इंटरनेट में खतरनाक खेल खेलने की लत स्कूल व कॉलेज के विद्यार्थियों में बढ़ रही है। शहर के हर मनोचिकित्सक के पास रोजाना एक या दो मरीज इस तरह की बीमारी वाले पहुंच रहे हैं। मनोचिकित्सकों का मानना है कि इस तरह के खेल खेलने से बच्चों में हिंसात्मक प्रवत्ती बढ़ती है।

14 साल के एक बच्चे की हत्या

बता दें कि दो दिन पहले ही शहर में 14 साल के एक बच्चे की हत्या उसके हम उम्र साथियों ने कर दी थी। डॉ. सत्यकांत ने बताया कि इंटरनेट में ऐसे खेलों की भरमार है, जिनमें गाली-गलौज, मारपीट, गोली चलाने की घटनाएं दिखाई जाती हैं। उनका कहना है कि इस तरह के गेम देखने वाला चिड़चिड़ा व गुस्सैल हो जाता है।

12 से 19 साल की उम्र में इस तरह के गेम दिमाग पर ज्यादा असर डालते हैं। हमीदिया अस्पताल में मनोचिकित्सा विभाग के एसोसिएट प्रोफसेर डॉ. जेपी अग्रवाल ने कहा कि उनकी ओपीडी में हर हफ्ते 5-6 मरीज इंटरनेट की लत वाले आ रहे हैं। इनकी उम्र 15 से 30 के बीच है। जेके अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. प्रीतेश गौतम ने कहा कि हर हफ्ते 5 से 10 मरीज उनके पास इंटरनेट की लत वाले पहुंच रहे हैं।

इंजीनियरिंग छात्रों को वेब सिरीज की लत

भोपाल में रहकर पढ़ाई करने वाले तीन इंजीनियरिंग छात्रों को वेब सिरीज गेम खेलने की ऐसी लत है कि वे रात में लगातार छह घंटे गेम खेलते हैं। इन गेम्स में कोई सेंसर नहीं है। गाली-गलौज, मारपीट और यहां तक कि मर्डर कैसे किया जाता है यह भी दिखाया जा रहा है। छात्रों को जब समझ आया कि अब वे इस लत से बाहर नहीं आ पा रहे हैं तो इलाज के लिए मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी के पास पहुंचे।

दो साल की बच्ची को भी गेम खेलने की लत

भोपाल के ही रहने वाले एक अभिभावक दो साल की बच्ची को लेकर शनिवार को मनोचिकित्सक डॉ. प्रीतेश गौतम के पास पहुंचे। माता पिता ने बताया कि बच्ची को मोबाइल में गेम खेलने की ऐसी लत लगी है कि रात में सोने नहीं देती। चिकित्सक ने माता-पिता की काउंसलिंग की। उन्होंने कहा कि बच्ची की लत नहीं छूटी तो बड़ी समस्या हो सकती है। उसके साथ समय बिताइए ताकि व मोबाइल गेम से दूर हो सके।

ऐसे किया जाता है इलाज

मनोचिकित्सकों ने बताया कि बच्चों के साथ ही माता-पिता की काउंसलिंग, दवाएं और साइको थैरेपी दी जाती है। लत धीरे-धीरे कुछ महीनों में छूट जाती है। कई माता-पिता इसे बीमारी नहीं मानते। इस वजह से डॉक्टर के पास नहीं ले जाते हैं। ऐसे बच्चों में खतरनाक प्रवृत्तियां जन्म लेने लगती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इंटरनेट की लत को बीमारी मान लिया है। इससे बचने का उपाय सिर्फ इससे दूर रहना ही है।