मनोज श्रीवास्तव, भिंड। भिंड-दतिया लोकसभा सीट कांग्रेस के लिए एक अभेद्य गढ़ बन गया है। पिछले 30 सालों के दौरान कांग्रेस ने यहां हर तरह के प्रयोग किए, कई पैतरे आजमाए, कमल को नहीं हिला पाए। पिछले 30 सालों के दौरान 8 लोकसभा चुनावों में भाजपा ने यहां अपने टिकट पर पांच चेहरों को मैदान में उतारा, भिंड के लोगों ने हर बार कमल को ही चुना है।

जड़ जनसंघ के दौर में ही बन गई थी। अब तक हुए कुल 14 चुनावों में से 10 बार भाजपा व जनसंघ परचम लहरा चुका है। एक बार बीएलडी व तीन बार कांग्रेस जीती है। 1984 के बाद से कांग्रेस यहां कभी भी नहीं जीती। 1989 से लगातार भाजपा ही चुनाव जीतती आ रही है। सीट पर मजबूत पकड़ का ही यह नतीजा है कि भाजपा ने पहली फुर्सत में यहां दिमनी (मुरैना) की पूर्व विधायक संध्या राय को चुनाव मैदान में उतार दिया। 1962 से लेकर 2009 तक यह सीट सामान्य रही। 2009 में इसे सुरक्षित कर दिया गया। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने प्रशासनिक सेवा से रिटायर हुए डॉ. भागीरथ प्रसाद को अपना प्रत्याशी बनाया। भाजपा ने उससे बड़ा दांव खेला। रात में कांग्रेस का टिकट लेकर आए डॉ. भागीरथ प्रसाद को सुबह अपने टिकट से लोकसभा का प्रत्याशी घोषित कर दिया। ऐनवक्त पर कांग्रेस ने विधायक इमरती देवी को मैदान में उतारकर साख बचाने की कोशिश की।

बसपा भी कमजोर नहीं रही

भिंड-दतिया सीट पर बसपा एक बार भी जीत का खाता नहीं खोल सकी, लेकिन 1996 और 1998 के चुनाव में बसपा के केदारनाथ कुशवाह ने दूसरे नंबर पर आकर ताकत का एहसास कराया था। इनसे पहले 1989 में रामबिहारी दूसरे नंबर पर रहे थे। इन चुनावों में कांग्रेस को तीसरे नंबर पर संतुष्टि करनी पड़ी थी।

इस बार दिक्कत में भाजपा

सुरक्षित सीट भिंड से पूर्व सांसद व मुरैना महापौर अशोक अर्गल का प्रबल दावेदारी में नाम चल रहा था। भाजपा ने ऐनवक्त पर पूर्व विधायक संध्या राय को मैदान में उतार दिया। पार्टी के इस कदम से पूर्व सांसद भागीरथ प्रसाद और टिकट के इच्छुक अशोक अर्गल खेमा रूठ गया है।

राजीव से करीबी भी काम नहीं आई

1991 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के करीबी वरिष्ठ पत्रकार उदयन शर्मा को मैदान में उतारा था। बाहरी प्रत्याशी का मुद्दा ऐसा हावी हुआ कि उन्हें भाजपा प्रत्याशी योगानंद सरस्वती ने 38 हजार 854 वोटों से हरा दिया। 1996 के चुनाव में विश्वनाथ शर्मा और 1998 में बालेंदु शुक्ला को भी बाहरी के मुद्दे पर हार का मुंह देखना पड़ा।