- शहर में ऋषभ सत्संग भवन में चल रहे प्रवचन में बोले आचार्य विनम्र सागर महाराज

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भिंड। नईदुनिया प्रतिनिधि

भगवान को हम रोज नमन करते हैं वह है अर्चना न किसी विद्वान का सहारा, न किसी महाराज का सानिध्य जैसा हमारा मन होता है हम उसी प्रकार से भगवान की आराधना करते हैं। परंतु संतों के सानिध्य में व्यक्ति नियम संयम से पूजा-अर्चना करता है। यह बात शहर के ऋषभ सत्संग भवन में मुनि श्री विनम्र सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कही।

मुनिश्री ने बताया कि कर्म आठ हैं, उन आठों कर्मों में आयु कम है। आयु के बिना कोई भी जीव शरीर धारण नहीं कर सकता है। आठ उपकर्ष्ज्ञ काल होते हैं, उन उपकर्ष कालों में जीव निश्चित ही आयु गति में वह बंध सकता है। जिस गति का आयु बंध किया जाता है, उस गति में वह बंध करता है। जिस गतिका आयु बंध किया है, उस गति में वह जीव अपनी आयु को लेकर जन्म लेता है। प्रतिक्षण आयु का विनाश होना शकाल मौत है। एक साथ आयु का विनाश होना अकाल मौत है, जैसे मटके में पानी भरा है। एक-एक बूंद करके पानी अपनी पूरी उम्र करके प्रतिक्षण गिर रहा है। महाराज श्री ने कहा कि मटके का अचानक फूट जाना पानी का एक साथ बहाव होना अकाल मरण है। आचार्य श्री ने कहा कि जहर खाने से, डर से, रक्त क्षय होने से, आत्महत्या करने से, दुघर्टना से, भूकंप से, असाध्य बीमार होने पर आहार न मिलने के कारण इन सभी कारणों के होने पर आयु के निषेद एक साथ गिर जाते हैं। इसे ही अकाल मौत कहते हैं। आचार्यश्री ने कहा कि कम से कम आयु क्षीण होना आयु कम समाप्त होने पर नियम से मरण होता है। इसे ही शकाल मरण कहते हैं, जैसे शरीर की त्वचा झुरझुरी हो जाना, कान टेढ़ा होना जाना, नाक टेढ़ी हो जाना यह शकाल मौत के कारण हैं। इस मौके पर सुभाषचंद्र, सचिन कुमार जैन, महेन्द्र कुमार, रतनलाल, देवचंद्र, राकेश जैन, चक्रेशा जैन, संगीता पवैया, अनीता जैन सहित अन्य लोग उपस्थित थे।