भिंड। नईदुनिया प्रतिनिधि

लोग जीने के लिए ढोंग-ढकोसला कर रहे हैं। आज का इंसान ढोंग का सहारा लेकर मतलबी, बदमिजाज, कुटिल, और पाखंड आदि से बंध चुका है। अगर हमें सफल जीवन की ओर कदम बढ़ाना है तो जीने का ढंग, सलीका, दयाल और धर्मात्मा बनना होगा। यह बात आचार्य विनम्र सागर महाराज ने ऋ षभ सत्संग भवन में चल रही धर्मसभा में श्रद्धालुओं से कही।

उन्होंने कहा इंसान के जन्म लेने का ढंग एक-सा है मगर एक इंसान पूजनीय बन जाता है और दूसरा मानवता कलंकित करने वाले के रुप में अपनी पहचान बनाता है। लोग पाखंड, मौका परस्ती, बदमिजाजी आदि का ढोंग रचा कर अपना रुबाब और रुतबा कायम कर रहे हैं। ऐसे लोग अपने जीवन की नैय्या को पार लगाने की बजाए डूबाने पर उतारु है। ढोंग के साथ जिया जा रहा जीवन विनाश का कारण है और सेवा पारायण, धर्मात्मा, सदाचारी होकर जीवन परिवार, समाज और राष्ट्र के विकास का पर्याय है। महाराजश्री ने कहा इंसान को हर दिन अपने जीवन की समीक्षा करना चाहिए।

आपकी बात के लोग कायल हों, घायल नहीं :

मुनिश्री ने कहा आज लोग खुद सुधरते नहीं है और दूसरों से ढंग के व्यवहार, सदाचार और दयालुता की आशा रखते हैं। खुद अमर्यादित व्यवहार करते हुए और सामने वाले से सद्व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं। दान देते हैं तो दिखावे का ढोंग करते हैं। बड़े पदों और ओहदे पर बैठ जाते हैं मगर सोच छोटी रखते है। इंसान खुद की जिंदगी को बेढंगी तरह से ढो रहा है और दूसरों को सुधारने की सीख दे रहा है। आपकी बात के लोग कायल हो घायल नहीं हो।

एकता संगठन की होती है

आचार्य श्री ने कहा कि सबसे बढ़ी शक्ति धन की नहीं एकता संगठन की होती है। उन्नति, विकास का सबसे बड़ा रास्ता है एकता। संगठन एकता में बड़ी ताकत होती है जो व्यक्ति एक से दूसरों को जोड़ता जाता है वह एक दिन परिवार, नगर, देश और राष्ट्र के निर्माण में भी सफल हो जाता है। हम देश राष्ट्र तक जब पहुंचे। आज तो हम अपने घर अपने परिवार अपने कुटुंब में एकता का शंखनाद करें। महाराज श्री ने कहा कि वह तभी होगा जब हम एक से एक जुड़कर चलें, आपके घर में चार सदस्य हैं तो चारों में खुशी का संचार करें। भले चार सदस्यों में मात्र आप ही सारा कार्य करते हों, मेहनत करते हों पर इसका मतलब यह नहीं कि आप दूसरो को उलाहना देने लगे, ताने कसने लगें।