भोपाल(नप्र)। प्रदेश के 1.30 लाख पुरुष अध्यापकों के तबादले इस साल भी नहीं हो सकेंगे। राज्य शासन पुरुष अध्यापकों की तबादला नीति पर अब तक निर्णय नहीं ले सका है। इस वजह से 19 साल से एक ही स्थान पर सेवा दे रहे पुरुष अध्यापकों को अगला सत्र भी उसी स्थान पर गुजारना पड़ेगा। तबादला नीति पर शासन को निर्णय लेना है। यह प्रस्ताव डेढ़ साल से शासन के पास है।

स्‍कूल शिक्षा विभाग ने शिक्षाकर्मी के रूप में 1994 से शिक्षकों की नियुक्ति शुरू की है, जो वरिष्ठता के आधार पर अध्यापक बना दिए गए हैं। विभाग ने इनमें से महिला और विकलांग अध्यापकों को तबादले का लाभ दे दिया है, लेकिन पुरुष अध्यापकों को नहीं दिया। इससे परेशान पुरुष अध्यापक कई बार मांग उठा चुके हैं। इसे देखते हुए दो साल पहले पुरुष अध्यापक तबादला नीति बनाने के काम शुरू हुआ। डेढ़ साल पहले यह प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया, लेकिन कोई निर्णय नहीं हुआ।

इसलिए उलझाया

शासन पुरुष अध्यापकों को तबादले का मौका देना ही नहीं चाहता है। दरअसल, ऐसा करने से अधिकारियों को बड़ी समस्या खड़ी होने का डर है। अधिकारियों के मुताबिक शिक्षाकर्मी और अध्यापकों की नियुक्ति के बदौलत विभाग ग्रामीण क्षेत्रों में रिक्त पद भर पाया है। कई क्षेत्र तो ऐसे हैं, जिनमें कोई जाना ही नहीं चाहता है।

फिर भी नौकरी के लिए अध्यापक चले गए। अब पुरुष अध्यापकों को तबादले का लाभ दे दिया, तो इन क्षेत्रों के पद खाली हो जाएंगे। जिन पर कोई भी आने को तैयार नहीं होगा। इन पदों को भरने के लिए शासन को फिर से भर्ती करना पड़ेगी। इसलिए तबादला नीति पर सोच-विचार चल रहा है।

निकाय भी नहीं बदल सकते : शासन ने 2005 में पुरुष अध्यापकों की समस्या पर ध्यान दिया था। उन्हें निकाय बदलने की सुविधा दी गई थी। यानी वे जिले में ही ग्राम पंचायत से नगर पंचायत में तबादला करा सकते थे, लेकिन दुष्प्रभाव को देखते हुए शासन ने यह सुविधा भी बंद कर दी।