आशीष दुबे, भोपाल । प्रदेश की सड़कों पर हर साल करीब 800 लोगों की जान ट्रैक्टर ट्रॉलियों से होने वाली दुर्घटनाओं से जा रही है। ये हालात तब हैं, जब पिछले कुछ वर्षों से इनके पीछे रिफ्लेक्टर लगाने का अभियान चल रहा है।

हालांकि आंकड़ों में दोपहिया वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं की बड़ी संख्या के चलते पुलिस का ध्यान हेलमेट की जांच और चालान बनाने पर ज्यादा है, जबकि ट्रैक्टर-ट्रॉलियां मौत बनकर सड़कों-हाइवे पर दौड़ रहीं हैं। राज्य सरकार के निर्देश पर हाल में सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए पुलिस व परिवहन महकमे ने कदम उठाए थे।

इनमें ट्रैक्टर ट्रॉलियों में रिफ्लेक्टर लगाने के लिए अभियान भी शामिल था। जिलों से पुलिस ने पीएचक्यू को जो आंकड़े भेजे, उनमें 9997 ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में रिफ्लेक्टर लगाने की सूचना थी। सबसे ज्यादा रिफ्लेक्टर विदिशा (1450), अशोकनगर (1000), जबलपुर (750) व खंडवा (539) लगाए गए।

अन्य जिलों में अपेक्षाकृत कम संख्या दर्ज किए गए। बनावट में बदलाव जरूरी पुलिस सूत्रों का कहना है कि ट्रालियों में बैक लाइट न होने और इसे हाइवे पर रास्ते में खड़ा करने से रात में दुर्घटनाएं होती हैं। बड़ी समस्या ट्रालियों के निर्माण की तकनीकें हैं, इनमें बैकलाइट नहीं होती।

पीटीआरई में डीआईजी नवलसिंह रघुवंशी मानते हैं कि इस समस्या को काबू करना व निर्माण में तकनीकी बदलाव होने जरूरी हैं। पुलिस के मैदानी अमले को लगातार सजगता व कार्रवाई के निर्देश दिए जाते हैं। मप्र में सभी श्रेणी के रजिस्टर्ड वाहनों की संख्या लगभग एक करोड़ है।इनमें सूबे में पंजीकृत ट्रैक्टरों की संख्या 95 हजार है। जाहिर हैं इतनी ही ट्रालियां भी हैं।

मप्र के परिवहन आयुक्त शैलेंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि हालिया समय में 30 हजार ट्रालियों में रिफ्लेक्टर लगाए जा चुके हैं। ट्रालियों पर अंकुश लगाना वाकई जरूरी है, इसके लिए केंद्र सरकार के स्तर पर कुछ प्रक्रियाएं चल रही हैं, इससे परिवहन विभाग को कार्रवाई करने में आसानी होगी।

पीएचक्यू के मुताबिक 2015 के पहले छह महीनों में भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन में ही 9424 दुर्घटनाएं हुई जिसमें 916 लोगों की जान गई और आठ हजार से अधिक घायल हुए हैं। सर्वाधिक 3078 दुर्घटना व 243 मौतें इंदौर में दर्ज हुई हैं। इसके बाद ग्वालियर में 1987 दुर्घटना व 229 मौतें हुई हैं।