सुशील पाण्डेय, भोपाल। रेलवे से सेवानिवृत्त होने के बाद साहित्यकार केके दुबे ने पूरी गीता ही चौपाई, दोहा, सोरठा और छंद के साथ रामचरित्र मानस की तर्ज पर लिख दी है। उनका मानना है के गीता में सारे वेदों का सार और जीवन दर्शन निहित है, लेकिन इसकी भाषा संस्कृति अलग होने के कारण लोग, खासकर युवा गीता को पढ़ नहीं पाते। इसलिए सरल और रोचक बनाते हुए हिंदी काव्यानुवाद के माध्यम से जन-जन तक गीता का सार पहुंचाने मैंने यह रचना की है। उनका मानना है कि मेरी रचना से जन सामान्य को पढ़ने और मनन करने में आसानी होगी। इस ग्रंथ को लिखने में डेढ़ वर्ष का समय लगा।

नाम दिया 'श्रीहरि-सरलगीता'

भोपाल निवासी कवि और साहित्यकार कमल किशोर दुबे के 'श्रीहरि-सरलगीता' नाम से अनुवादित इस काव्य में हिंदी भाषा के प्रति अनुराग की सहज अभिव्यक्ति होती है। सर्वसाधारण की सुविधा के लिए दुरूह श्लोकों को सहज, सरल एवं बोधगम्य बनाया है।

अधिक प्रवाहपूर्ण बनाने के लिए खड़ी हिंदी के साथ-साथ आवश्यकतानुसार अवधी के शब्दों का प्रयोग किया गया है। आज जब हिन्दू धर्मावलंबी अपने धर्म एवं संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे वातावरण में इस कार्य की सफलता धर्मसेवा से कम नहीं है। सांसारिक जीवन के प्रवेशद्वार पर किंकर्तव्यविमढ़ होकर खड़े लोगों, किशोर, तरुण और युवाओं को जीवन के समग्र ज्ञान की महती आवश्यकता होती है। ऐसा सम्पूर्ण व्यावहारिक ज्ञान गीता में उपलब्ध है।

खुद के अनुभव से मिली प्रेरणा: दुबे

केके दुबे ने बताया कि घर में माहौल के अनुरूप बचपन से रामचरित्र मानस पढ़ता था और ग्रंथ की लोकप्रियता से प्रभावित था। कभी-कभी गीता भी पढ़ लेता था, लेकिन हिंदी अनुवाद के अतिरिक्त श्लोक समझ नहीं आते थे, इसलिए विचार आया कि गीता का अनुवाद रामचरित्र मानस की तर्ज पर किया जाए।

दुबे की इस पहल को शारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, महामंडलेश्वर नृसिंह पीठाधीश्वर डॉ. स्वामी श्यामदास महाराज, अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.रामदेव भारद्वाज, संस्कृति संस्थान के प्रकाश पाण्डेय और साहित्यकार कैलाशचंद्र पंत का आशीर्वचन और सराहना मिली है।