भोपाल। 'मैंने शुरुआत में काफी आर्ट फिल्में की हैं, लेकिन आर्ट सिनेमा में पैसा नहीं है। यही वजह है कि अपने जीवन को सामान्य करने के लिए मैंने कमर्शियल फिल्में कीं। आर्ट सिनेमा में तारीफ तो बहुत है, लेकिन तवज्जो कमर्शियल फिल्मों से ही मिलती है। फोक थिएटर की जड़ें भारत में काफी मजबूत हैं। लेकिन आज भी प्रोग्रेसिव थिएटर एमैच्योर लेवल पर ही है। इससे जुड़े लोगों को आजीविका चलाने के लिए आज भी दूसरे माध्यम तलाशने पड़ रहे हैं। लोग अभी भी महंगी टिकट लेकर थिएटर देखना पसंद नहीं करते।'

यह कहना है पद्मश्री सम्मान प्राप्त अभिनेता ओमपुरी का। वे मप्र नाट्य विद्यालय में गेस्ट फैकल्टी के रूप में एक्टिंग की क्लासेस ले रहे हैं। इस दौरान उन्होंने रंगकर्म, अभिनय समेत निजी जिंदगी की बातें कीं।

पैरलल सिनेमा के लोग तब भी कम थे और आज भी

'पहले भी सामानांतर सिनेमा बनाने वाले लोगों की संख्या फिल्म जगत में बहुत कम थी और आज भी काफी कम है। ऐसा नहीं है कि, बॉलीवुड में आज ही पैरलल सिनेमा पर कम काम हो रहा है। दरअसल, पहले कमर्शियल सिनेमा पर काम करने वाले लोग कम थे और अब बढ़ गए हैं। इस वजह से दोनों के बीच का सिर्फ अनुपात कम हुआ है, असल संख्या आज भी उतनी ही है। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। माहौल में कोई तब्दीली नहीं है, सिर्फ लोगों के नजरिए में फर्क पड़ा है।'

'रियल पॉलिटिक्स' कभी नहीं

'मैंने फिल्म 'डर्टी पॉलिटिक्स' में एक नेता का किरदार निभाया है। लेकिन रियल लाइफ में मैंने कभी भी पॉलिटिक्स ज्वाइन करने का नहीं सोचा है। किसी भी दूसरे काम की तरह राजनीति में भी अच्छी और

बुरे दोनों तरह के लोग हैं। सभी खराब नहीं हैं।'

किरदार की डिमांड

'हर किरदार की अपनी अलग डिमांड होती है। डर्टी पॉलिटिक्स में मेरा किरदार एक ऐसे नेता का है, जिसके किसी महिला से संबंध हैं। यही फिल्म में भी दिखाया गया है।'

अब नहीं करना पड़ता स्ट्रगल

'एनएसडी के स्टूडेंट्स को अब बॉलीवुड के लिए ज्यादा स्ट्रगल नहीं करना पड़ता। अब एनएसडी की एक अच्छी पहचान है और डायरेक्टर्स को पता है कि एनएसडी पासआउट्स पर बिना किसी डर के दांव खेला जा सकता है।'