- रवींद्र भवन में दो दिवसीय 'दुर्लभ वाद्य प्रसंग' समारोह शुरू

भोपाल। नवदुनिया रिपोर्टर

रवींद्र भवन में बुधवार को दो दिवसीय 'दुर्लभ वाद्य प्रसंग' समारोह शुरू हुआ। उस्ताद अलाउद्दीन खां सगीत एवं कला अकादमी की ओर से आयोजित समारोह में संगीत की खूबसूरत सभा सजी। वाद्ययंत्रों से आते जाते स्वर तपती दोपहरी की बाद कला रसिकों को ठंडी बौछार से प्रतीत हुए। सारंगी वृंद, शहनाई और ताऊस की सुर लहरियां कानों में रस घोलती सी प्रतीत हुईं। वादन सभा की शुरुआत अब्दुल लतीफ खां शिष्य मंडल के कलाकारों ने सारंगी वृंद प्रस्तुति से की। 18वीं शताब्दी के इस वाद्ययंत्र के साथ कलाकारों ने लयकारी का शानदार ताना-बाना बुना। प्रस्तुति के लिए राग सरस्वती का चयन किया, जिसमें अलाप लेते हुए राग को विस्तार दिया। इसके बाद तीन ताल में बंदिश पेश की। अगली प्रस्तुति द्रुत मध्य लय और तीन ताल की रही। अंत में एक ताल की प्रस्तुति के साथ कलाकारों ने समापन किया। इस प्रस्तुति में हनीफ हुसैन, जावेद खां ने सारंगी और तबले पर शाहनाबाज और असगर अहमद ने लहरा दिया। प्रस्तुतियों से पूर्व वर्ष 2016-17 के लिए दयाशंकर और 2017-18 के लिए संदीप सिंह को उस्ताद लतीफ खां सम्मान ने नवाजा गया।

पर्शियन भाषा से मिला नाटक 'ताऊस'

समारोह में नई दिल्ली से आए दयाशंकर एवं साथी कलाकारों ने शहनाई वादन किया। उन्होंने शहनाई वादन के लिए राग श्याम कल्याण का चयन किया। इसमें विलंबित एक ताल में रचना पेश की। इसके बाद द्रुत तीन ताल और अंत में दादरा की प्रस्तुति दी। समारोह की अंतिम सभा जालंधर से आए कलाकार संदीप सिंह की रही। उन्होंने ताऊस वादन के जरिए श्रोताओं-दर्शकों के मन में जगह बनाई। 17वीं शताब्दी के इस वाद्ययंत्र को मयूरी वीणा कहा जाता है। क्योंकि मोर को पर्शियन भाषा में ताऊस कहा जाता है। इसलिए इस वाद्य को ताऊस के नाम जाना जाता है। इस वाद्ययंत्र में सारंगी और सितार का मिश्रण है। संदीप ने बताया कि उन्हें यह वाद्ययंत्र उनके पिता त्रिलोचन सिंह ने पाकिस्तान से लाकर दिया था। संदीप ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सबसे पहले 2006 में इस वाद्ययंत्र के साथ प्रस्तुति दी थी।