शशिकांत तिवारी, भोपाल। ब्यूटी पार्लर चलाने वाले 30 साल के हसन (बदला नाम) के हाव- भाव लड़कियों जैसे हैं। उनके पास लड़कियां भी मेकअप करवाने आती हैं। वह लड़कियों जैसे ही रहता है। वह मुंबई में जाकर बड़ा मेकअप मैन बनना चाहता है। हसन को लगता है लिंग परिवर्तन करवाकर लड़की बनने के बाद वह ज्यादा पैसा कमा सकेगा, इसलिए उसने लड़की बनने का फैसला कर लिया।

यह कोई पहला या एकमात्र मामला नहीं है। भोपाल के मनोचिकित्सकों और मनोविज्ञानियों के पास लगातार ऐसे मामले बढ़ रहे हैं। हमीदिया अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग में पहले सालों में कोई व्यक्ति लिंग परिवर्तन की इच्छा लिए पहुंचता था लेकिन अब साल में औसतन इस तरह के तीन से चार मामले सामने आ रहे हैं।

सभी कुदरत की इच्छा के विपरीत महिला से पुरुष और पुरुष से महिला बनना चाहते हैं। मनोचिकित्सकों के मुताबिक इसके पीछे बड़ी वजह लिंग परिवर्तन करवाकर व्यवसाय में कामयाबी पाना या फिर किसी दूसके के जैसे बनने की इच्छा भी है। भोपाल में ऐसे लोगों के लिए काम करने वाले संगठन भी बन गए हैं।

रोल मॉडल को देख लिंग परिवर्तन करवाना गलत

साइकेट्रिस्ट और क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट का कहना है कई लोग शारीरिक तौर पर लड़का-लड़की होते हैं, लेकिन अंदर से उनके पूरे लक्षण विपरीत सेक्स वाले होते हैं। ऐसे लोग यदि लिंग परिवर्तन कराते हैं तो उन्हें रोका नहीं जाना चाहिए। लेकिन,यदि कोई किसी रोल मॉडल से प्रभावित होकर सेक्स चेंज थैरेपी करवाता है तो उसे रोका जाना चाहिए।

बचपन से ही पहचान सकते हैं लक्षणों को

- लड़की का लड़कों वाले खेल खेलना या लड़कों का लड़की वाले खेल खेलना

- कपड़ों से लेकर सजना-संवरना तक विपरीत सेक्स वालों की तरह

- विपरीत सेक्स वालों जैसी बॉडी लैंग्वेज

- समाज से कट कर रहना

शरीर को ऐसे होता है नुकसान

सेक्स चेंज कराने के पहले हार्मोन थैरेपी करीब दो साल तक चलती है। इससे शरीर को नुकसान हो सकता है। हार्मोन ही शरीर की सभी क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। ऊपर से हार्मोन लेने पर देर सबेर नुकसान हो सकता है।

इनका कहना है

पहले सालों में कोई लिंग परिवर्तन कराने आता था लेकिन करीब 3 साल से हर साल तीन या चार केस आ रहे हैं। यह सिर्फ हमीदिया की बात है,दूसरे साइकेट्रिस्ट व अस्पतालों को मिला लें तो प्रदेश में बड़ा आंकड़ा निकलेगा। ऐसे लोगों का पहले साइको थैरेपी करते हैं, इसके बाद सर्टिफिकेट देते हैं।

डॉ. आरएन साहू प्रमुख, मनोचिकित्सा विभाग हमीदिया अस्पताल

केस-1: सीहोर की रहने वाली 24 साल की नेहा (बदला नाम) की घर वालों ने शादी की बात शुरू की तो उसने मना कर दिया। पिता से बोली मैं अंदर से लड़की नहीं लड़का हूं। वह अपने गांव के पास की ही एक लड़की सपना (बदला नाम) से शादी करना चाहती है, जो पहले से शादी-शुदा है। सपना भी अपने पति से तलाक लेकर नेहा से शादी को तैयार है। शादी के पहले नेहा लिंग परिवर्तन कराकर लड़का बनेगी।

केस-2 : भोपाल के सरोजनी नायडू कॉलेज (लड़कियों का कॉलेज) में एक लड़का करीब तीन साल तक लड़की बनकर पढ़ता रहा। किसी को हवा नहीं लगी। वजह, उसका पहनावा, शक्ल-सूरत लड़कियों जैसी थी। लड़का होने की बाद भी वह खुद को लड़की मानता था। इसका खुलासा उस वक्त हुआ जब वह हमीदिया अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग में सर्टिफिकेट के लिए पहुंचा। डॉक्टरों ने साइको थैरेपी किए बिना उसे सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया।

केस-3 : भोपाल में ही दो छात्र परिवार से बगावत कर अलग कमरा लेकर रहते हैं। इसमें एक खुद को फीमेल मानता है। वह दोस्त की माता-पिता की सेवा सास-ससुर मानकर करता है। उसके हाव-भाव भी ऐसे ही हैं। लिहाजा वह खुद जेंडर बदलकर लड़की बनना चाहता है। उनका कहना है लिंग परिवर्तन के बाद वे शादी करेंगे।