भोपाल। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं के मानदेय घोटाले में परियोजना कार्यालयों में पदस्थ कुछ चपरासी और आउटसोर्स पर कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटर भी बराबर के जिम्मेदार हैं। मामले की जांच में पता चला है कि आरोपितों ने अपने दोस्तों, रिश्तेदारों के अलावा इन कर्मचारियों के बैंक खातों में भी राशि जमा कराई थी। महिला एवं बाल विकास विभाग ने इनके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज करने के लिए संबंधित थानों को लिखा है, लेकिन अब तक संबंधितों के खिलाफ मामले दर्ज नहीं हुए हैं।

राजधानी की आठ परियोजनाओं में वर्ष 2017 में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सहायिकाओं को दिए जाने वाले मानदेय में गड़बड़ी सामने आई थी। चार बार की जांच में यह मामला पकड़ में आया। आरोपी परियोजना अधिकारी, बाबू और लेखा अधिकारियों ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के नाम पर एक माह में दो-दो बार मानदेय निकाल दिया था। एक बार की राशि कार्यकर्ता के खाते में डाली जा रही थी तो दूसरी बार की राशि इन कर्मचारियों के बैंक खातों में डाली जा रही थी।

पूरा मामला खुलने के बाद विभाग ने संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर कराने को तो लिखा, लेकिन खुद इन कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं की। सूत्र बताते हैं कि सौ से ज्यादा लोगों के बैंक खातों में राशि डाली जा रही थी। यह मामला ढाई करोड़ रुपए की गड़बड़ी से शुरू हुआ था और अब तक 12 करोड़ रुपए से अधिक राशि की गड़बड़ी का खुलासा हो चुका है।

ऐसे खातों में जा रही थी राशि

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के नाम से बैंक खाते हैं। इन खातों में हर माह मानदेय की राशि डाली जाती है। फर्जीवाड़ा करने वाले परियोजना अधिकारी और बाबू सूची बदलकर चपरासी, कंप्यूटर ऑपरेटर और दोस्तों के बैंक खातों में राशि डलवा देते थे। कार्यकर्ताओं को माह में दो बार मानदेय दिया जा रहा है। यह गड़बड़ी कोषालय के अफसर भी नहीं पकड़ पाए।

स्थगन लेकर काम कर रहे परियोजना अधिकारी

मामले में लिप्त परियोजना अधिकारी निलंबन के खिलाफ हाईकोर्ट से स्थगन लेकर नौकरी कर रहे हैं। वैसे इन अधिकारियों को बर्खास्त करने की कार्रवाई चल रही है, लेकिन कोर्ट के स्थगन आदेश का हवाला देकर विभाग के वरिष्ठ अफसर कार्रवाई करने से बच भी रहे हैं। ज्ञात हो कि अब तक चार लिपिक-बाबुओं को बर्खास्त किया जा चुका है।