भोपाल। हमें लगता है कि हम बच्चों को दुनिया में आने के बाद सिखाना शुरू करते हैं। जबकि वह तो तभी से सीखना और समझना शुरू कर देते हैं जब वह अपनी मां के गर्भ में होते हैं। इस बात के वैज्ञानिक आधार हैं कि गर्भस्थ शिशु मां के आचरण व आसपास के माहौल से ही संस्कारित होने लगता है। इसलिए हमारी वैदिक परंपराओं अनुसार गर्भाधान संस्कार करना बहुत जरूरी होता है। यह बात रविवार को गर्भाधान संस्कार का महत्व बताने जबलपुर से आईं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अमिता सक्सेना ने कही।

गायत्री शक्तिपीठ में आयोजित कार्यशाला में उन्होंने कहा कि समाज में आज भी भ्रूण हत्या जैसे पाप से पार नहीं पाया जा सका है। केवल बेटे की चाह रखने वाले पारिवारिक माहौल में गर्भस्थ बच्ची टॉम-बॉय बन जाती है। क्योंकि उसने अपने गर्भ में ही यह समझ लिया होता है कि उसका परिवार बेटी नहीं बल्कि बेटा चाहता है। ऐसे में उसके सबकॉन्सीयस माइंड में यह बात घर कर जाती है और वह लड़की होते हुए भी लड़कों जैसा आचरण करने लगती है।

गर्भवती महिलाओं खिलाई जाती है औषधी युक्त खीर

गौरतलब है कि गायत्री परिवार द्वारा पिछले कई दिनों से गर्भाधान संस्कार के लिए अभियान चलाया जा रहा है। जिसके लिए गायत्री परिवार के सदस्य घर-घर जाकर हवन अनुष्ठान करते हैं। गर्भवती महिलाओं को औषधी युक्त खीर का सेवन कराते हैं, साथ ही उन्हें धार्मिक ग्रंथ भी उपहार स्वरूप देते हैं। इसी अभियान को आगे बढ़ाने के लिए रविवार को यह कार्यशाला आयोजित की गई थी।

पॉवर पॉइंट के प्रिजेंटेशन के माध्यम से समझाया गर्भाधान का रहस्य

कार्यशाला में फेडरेशन ऑफ ओब्सटेट्रि एंड गायनोकोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया (एफओजीएसआई) के लगभग 150 डॉक्टर्स समेत अन्य विभिन्ना अस्पतालों में कार्यरत 200 डॉक्टर्स मौजूद रहे। कार्यशाला में मौजूद करीब 800 महिलाओं को पावर पॉइंट प्रिजेंटेशन के माध्यम से गर्भाधान संस्कार से जुड़े विभिन्ना पहलुओं एवं रहस्यों को समझाया गया।