भोपाल से वैभव श्रीधर। मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान ने यह उम्मीद जगा दी है कि इस बार रिकॉर्ड बनेगा। पहले दौर की छह सीटों पर 29 अप्रैल को हुए चुनाव में लगभग 75 फीसदी मतदाताओं ने मताधिकार का इस्तेमाल किया। मध्य प्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीएल कांताराव इसका श्रेय भयमुक्त माहौल और व्यवस्था में भरोसे को देते हैं। वे मानते हैं कि अगले तीन चरणों में भी यह बढ़त बरकरार रहेगी क्योंकि मतदाता जागरूक हुआ है। उसने वोट की ताकत को पहचाना है। राजनीतिक दल, मीडिया सहित सभी पक्षों ने अपनी जिम्मेदारी भी पूरी शिद्दत से निभाई है। यही वजह है कि 42 डिग्री तापमान में भी मतदान केंद्रों में लाइन लगी रही। 6 मई को मप्र में लोकसभा के दूसरे चरण का मतदान होना है। लोकतंत्र के उत्सव में मतदाता की बढ़ती भागीदारी के अच्छे संकेत पर नईदुनिया की वीएल कांताराव से विशेष बातचीत...

मप्र में पहले चरण में हुई उत्साहजनक वोटिंग को आप कैसे देखते हैं। क्या यह संयोगभर है या वास्तव में जागरूकता का प्रतीक है?

पहले दौर में दूरस्थ, जंगल और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में मतदान था। इसके बाद भी रिकॉर्ड मतदान दर्ज किया गया। देर शाम तक केंद्रों में मतदाताओं की लाइनें लगी रही। यह भी तब था जब तापमान 42 डिग्री या उससे अधिक था। यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है। इसके मायने साफ हैं कि मतदाताओं में जागरूकता आई है और इसके लिए जो कदम उठाए गए हैं वे कारगर साबित हो रहे हैं।

मप्र में हर चरण के चुनाव एक भौगोलिक अंचल का प्रतिनिधित्व करते हैं? क्या अच्छे मतदान को एक इलाके विशेष का मूड मानें या पूरे प्रदेश में मतदान को लेकर उत्साह है?

यह बात सही है कि मप्र में चार चरणों में अलगअलग भौगोलिक अंचल में चुनाव हो रहे हैं लेकिन जो ट्रेंड दिख रहा है, उससे पूरा भरोसा है कि अगले तीन चरणों में भी बढ़त बरकरार रहेगी। अच्छा मतदान सिर्फ एक क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं हो सकता है। विधानसभा चुनाव में भी हमने देखा है कि पूरे प्रदेश में मतदान को लेकर उत्साह था। हमें यही फीडबैक हर जगह से मिल रहा है।

मतदान बढ़ाने में मतदाता जागरूकता कार्यक्रम का कितना योगदान मानते हैं?

मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों ने बड़ी भूमिका निभाई है। इस चुनाव में मतदाताओं को एक पहचान पत्र साथ लेकर आना अनिवार्य किया गया है। इसका माकूल प्रचार हुआ। यही वजह है कि पहले चरण के कहीं से भी यह शिकायत नहीं आई कि मतदान करने का मौका नहीं मिला। जागरूकता निश्चित तौर पर बढ़ी है।

आपकी क्या खास पहल रही जो भारी गर्मी के बावजूद मतदाताओं को बूथ तक ले आई?

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की तलाश में दूसरे शहर या राज्य जाने की खूब सूचनाएं मिलती हैं। इसको मद्देनजर रखते ही झाबुआ जिला प्रशासन ने प्रयोग किया। गुजरात में टीम भेजकर फैक्टरी संचालकों से बात की। इसका असर यह हुआ कि मजदूर न सिर्फ मतदान करने घरों को आने के लिए आगे आए बल्कि फैक्टरी संचालकों ने उन्हें भेजने के इंतजाम भी किए। इस प्रयोग को चुनाव आयोग ने भी सराहा। इसी तरह के कई प्रयोग जिला स्तर पर किए जा रहे हैं। इसके साथ ही क्यूलेस बूथ, दिव्यांग, गर्भवती, धात्रीमाताओं और बुजुर्गों का पंजीयन करके लाइन में सबसे पहले वोट डलवाने की सुविधा ने असर दिखाया। अन्य सुविधाएं भी जुटाई गईं।

मताधिकार को लेकर आई जागरूकता की वजह किसे मानते हैं। सोशल मीडिया या इससे उपजा जिम्मेदारी का भाव?

जागरूकता का श्रेय किसी एक को नहीं दिया जा सकता है। प्रशासनिक अमले ने अपने काम को पूरी शिद्दत से अंजाम दिया तो राजनीतिक दलों ने भी गांव-गांव जाकर प्रचार किया। मतदाता जागरूकता कार्यक्रम के साथ अखबार, टीवी चैनल्स और सोशल मीडिया ने भी भूमिका निभाई। गैर सरकारी संगठनों को भी मतदान कार्यक्रमों से जोड़ा गया। ऐसा तानाबाना बुना गया जिससे कोई न कोई माध्यम मतदाता तक पहुंच ही गया।

एनआरआई और पलायन करने वाले मजदूरों के मतदान पर विचार कर रहा है आयोग : रावत

चुनाव आयोग के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त और मप्र कैडर के आईएएस रहे ओपी रावत पहले दौर के चुनाव में हुई बंपर वोटिंग की वजह मतदाता जागरूकता के साथ स्थानीय मुद्दों पर मतदाताओं के घरों से बाहर निकलने को मानते हैं। उनका कहना है कि पूरे देश में पलायन करने दूसरे शहर या राज्य काम की तलाश में लगभग साढ़े चार करोड़ मतदाता चले जाते हैं। इसी तरह डेढ़ करोड़ एनआरआई हैं। इनसे किसी तरह मतदान कराया जाए, इस पर चुनाव आयोग विचार कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी इस संबंध में चल रही है। उल्लेखनीय है कि मतदान करने के लिए नईदुनिया भी पाठकों से लगातार अपील कर रहा है। उन्हें प्रेरित कर रहा है। रावत की 'नईदुनिया' की विशेष बातचीत के अंश...

मप्र में उत्साहजनक मतदान की क्या वजह है। आपके समय और आज की तुलना में क्या अंतर देखते हैं?

पूरे देश के चारों चरणों को देखा जाए तो मतदान 2014 के मुकाबले बराबर या थोड़ा- बहुत ही ऊपर-नीचे रहा है। जहां तक मप्र की बात है तो ऐसा लगता है कि यहां स्थानीय मुद्दे मतदाताओं को घर से बाहर निकाल लाए।

चुनाव आयोग ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए कब सोचा और फोकस करके काम किया?

आयोग यूं तो मतदान बढ़ाने के लिए लगातार काम करता रहा है लेकिन 2011 से मतदाता जागरूकता कार्यक्रम (स्वीप) चलाया गया। इसमें लगातार नए-नए प्रयोग हो रहे हैं। बजट भी बढ़ा है। चुनाव पाठशाला से लेकर कई तरह के कार्यक्रम चलाए गए हैं। आयोग का उद्देश्य यही रहता है कि ज्यादा से ज्यादा पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज हों और वे वोट करने आएं। इसके लिए बूथ लेवल ऑफिसर कई बार मतदाताओं से घरों पर जाकर संपर्क साधता है। 2014 में 66 प्रतिशत मतदान इसका ही नतीजा है जो सर्वाधिक रहा था।

क्या सूचना क्रांति, सोशल मीडिया की वजह से मतदान को लेकर जागरूकता आई है?

सूचना क्रांति, सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया ने अपनी भूमिका निभाई है। लोगों में मतदान को लेकर जागरूकता बढ़ी है, इसमें कोई संदेह नहीं है। हर व्यक्ति अपने वोट की ताकत को समझने लगा है। आयोग ने मतदाताओं को जागरूक करने के लिए उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड और संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करने की व्यवस्था बनाई। पहले यह धारणा रहती थी कि एक वोट से क्या होता है, मतदान दिवस को छुट्टी की तरह लेते थे लेकिन अब अंतर आ गया है।

ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरों में कम मतदान क्यों होता है?

धीरे-धीरे यह अंतर कम होता जा रहा है। बड़े शहरों की मतदाता सूची में पहले डुप्लीकेट मतदाताओं की बड़ी संख्या होती थी। दरअसल, शहरों में बाहर से आने वालों की बड़ी संख्या होती है। छात्र भी पढ़ने के लिए आते हैं। मजदूर भी आते-जाते रहते हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण में इनके नाम तो जुड़ जाते थे पर वे मतदान के वक्त चले जाते थे। मप्र में भी कुछ समय पहले 68 लाख डुप्लीकेट वोटर सूची में दर्ज थे। इसको लेकर अभियान चले और सूची को सही कर दिया। जब मैंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त का कार्यभार सौंपा तब एक लाख ही ऐसे मतदाता सूची में बचे थे। जैसे ही मतदाता सूची पूरी तरह क्लीन हो जाएगी तो शहरों में भी मतदान का प्रतिशत बढ़ जाएगा।

मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए क्या महत्वपूर्ण कदम उठाए गए?

मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए कतार रहित मतदान केंद्र बनाने की पहल की गई है। यह ऐसे लोगों के लिए थी जो मतदान तो करना चाहते हैं पर लाइन में लगकर इंतजार नहीं करना चाहते। ऐसे मतदाताओं को पंजीयन कराकर एक निश्चित समय में मतदान की सुविधा दी। इसके साथ ही दिव्यांगजन, गर्भवती और धात्रीमाताओं के साथ बुजुर्गों के लिए पंजीयन कराकर लाइन से अलग हटकर मतदान कराने की व्यवस्था बनाई। इतना ही नहीं, इन्हें मतदान केंद्र तक पहुंचने के लिए परिवहन और सहयोगी की सुविधा भी मुहैया कराई गई।