भोपाल। बिछड़े दोस्त एक बार फिर कहीं टकरा जाएं, तो उसकी बात क्या है, और अगर वो जीवन साथी ही बन जाए, तो उससे ज्यादा शायद किसी और को कुछ नहीं चाहिए। दिल को छू जानी वाली इसी कहानी ने दर्शकों को अपने में देर तक बांधे रखा। फिल्मी कहानियों से प्रेरित नाटक 'सर्दियों का फिर वही मौसम' का मंचन गुरुवार को भारत भवन में अंतरंग सभागार में हुआ। रंग संस्था की ओर से मंचित नाटक का लेखन व निर्देशन रंग निर्देशक आशीष श्रीवास्तव ने किया।

संकोच से शुरू हुई कहानी

नाटक की शुरुआत 2012 की सर्दियों से हुई। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर अपनी गाड़ी का इंतजार कर रहे दो मुसाफिर एक-दूसरे के बगल में बिना कुछ बोले चुपचाप बैठे थे। 55 वर्षीय व्यक्ति अभिनव और 54 वर्षीय महिला पूजा कपूर। स्वभाव से चंचल और बातूनी अभिनव से बात करने में पूजा शुरुआत में तो थोड़ी हिचकिचाई, फिर धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई। बातचीत से पता चलता है कि दोनों के जीवन साथी अब इस दुनिया में नहीं हैं।

एलबम ने बदल दिया विषय

ट्रेन लेटहोने के कारण बातचीत का सिलसिला काफी लंबा होता चलता है। अभिनव को अस्थमा होने के कारण सर्दी में सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। मदद के लिए पूजा ने उसके बैग से इन्हेलर निकालकर दी, इन्हेलर निकालते समय उसे अभिनव के बैग में एक फोटो एलबम मिला, जिसे देखकर उसकी आंखें इस पर मानो टिक सी गईं। वह एलबम को उठाकर पलटने लगी। अचानक, उसकी नजर एक फोटो पर जाकर रुक गई, जो उसके कॉलेज के समय का है। एक ग्रुप फोटो जिसमें खुद पूजा भी मौजूद है। पूजा को कॉलेज के दिनों में शर्मीले और पढ़ाकू अभिनव की याद आई। अरे ये तो वही अभिनव है, मेरा स्कूल का मित्र। फिर क्या था, दोनों के बीच कॉलेज के दिनों की बातें और यादें बढ़ती चली गईं। पूजा के कहने पर अभिनव कॉलेज के दिनों में खेले गए नाटकों के संवाद और कविताएं सुनाने लगा, थोड़ी ही देर में दिल्ली से भोपाल की ट्रेन का अनाउंसमेंट हुआ। नाटक के अंत में दोनों दूसरे प्लेटफॉर्म की तरफ साथ एक नए सफर की ओर जाते देते हैं।

नाटक में मंच पर सरोज शर्मा, राजीव श्रीवास्तव, स्कंद मिश्रा, अवधेश खरे, आदित्य क्षत्रीय, सलमान ने शानदार अभिनय पेश किया। प्रस्तुति में प्रकाश परिकल्पना अनूप जोशी बंटी की और वस्त्र सज्जा रेणु वर्मा की रही।