चौक स्थित जैन धर्मशाला में हुए प्रवचन

भोपाल। नवदुनिया प्रतिनिधि

शरीर के साथ संबंध जोड़ते हैं तो शरीर से लगाव रहता है। आत्म स्वरूप का ज्ञान कर्मों का भेदन करने पर होता है। मोह की भावना रहेगी तो पल-प्रतिपल दुखों के साथ जीवन में आकुल-व्याकुल परिणाम बने रहेंगे। मनुष्य को राग-द्वेष, मोह-कषाय के भावों ने ही भटका कर रखा है। कर्मों के संसार से निकलें। आत्म दर्शनमय जीवन जीने का प्रयास करें।

उक्त उद्गार मुनि विद्यासागर महाराज ने चौक जैन धर्मशाला में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब तक आचरण में धर्म नहीं होगा, आध्यात्म नहीं होगा तो दुराचरण हमारे ऊपर हावी रहेगा। मुनिश्री ने कहा धन को साधन का माध्यम बनाएं, धन को साध्य बनाकर जीवन का पतन न करें। गृहस्थ जीवन में धन को जीवनयापन का माध्यम ही बनाया जा सकता है, क्योंकि संसार में सारे रिश्ते-नातों में कटुता धन-संपत्ति के कारण ही होती है। सारे पाप मनुष्य अत्याधिक आकांक्षाओं के वशीभूत होकर अत्याधिक धन प्राप्ति के चक्कर में पड़ता है। अमीर आदमी तो पेटी भरने में लगा हुआ है। गरीब आदमी पेट भी नहीं पाल पा रहा। यह संसार की सबसे बड़ी विडंबना है, बचे हुए धन को सद्कार्यों में लगाएं। धर्मसभा का शुभारंभ आचार्य सन्मति सागर महाराज, आचार्य विद्या सागर महाराज के चित्र के समक्ष द्वीप प्रज्वलन के साथ किया गया। समाज के श्रेष्ठीजनों ने द्वीप प्रज्वलन किया और नागपुर, सांगली, कोल्हापुर महाराष्ट्र से आए श्रावकों द्वारा श्रीफल भेंटकर आशीर्वाद लिया गया।

संयम दिवस के रूप में मनेगा पिच्छिका परिवर्तन दिवस

दिगंबर जैन पंचायत कमेटी ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रमोद हिमांशु मीडिया प्रभारी अंशुल जैन ने बताया कि रविवार को आचार्य सन्मति सागर के शिष्य मुनि विद्या सागर, मुनि शांति सागर और मुनि प्रशांत सागर का पिच्छिका परिवर्तन संयम दिवस के रूप में मनाया जाएगा। दोपहर एक बजे जवाहर चौक जैन मंदिर प्रांगण में यह आयोजन होगा, जिसमें अनेक धर्मावलंबी साक्षी बनेंगे। आयोजन की तैयारियां चल रही हैं। आयोजन स्थल पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशाल एलईडी स्क्रीन लगाई जा रही है। आयोजन में राजधानी भोपाल के साथ अनेक शहरों के धर्मावलंबी शामिल होंगे।

पिच्छिका संयम का उपकरण

जैन संत हमेशा अपने पास शास्त्र, पिच्छिका और कमंडल रखते हैं। पिच्छिका संयम का उपकरण है, क्योंकि संतों की दैनिक चर्या में बैठने-उठने की जगह मार्जिन करनी पड़ती है। पिच्छिका मयूर पंखी होती है, जो अत्याधिक कोमल होते हैं। इससे जाने-अनजाने में किसी भी जीव को नुकसान नहीं पहुंचता। पुरानी पिच्छिका जीवन पर्यन्त संयम धारण करने वाले श्रद्धालुओं को दी जाती है। नवीन पिच्छिका देने का सौभाग्य भी ऐसे ही श्रावकों को मिलता है।